कमीशन अटका, सिस्टम पर सवाल: महीनों से भुगतान लंबित रहने से राशन डीलर ने की आत्महत्या; प्रशासनिक व्यवस्था की खुली पोल

कमीशन अटका, सिस्टम पर सवाल: महीनों से भुगतान लंबित रहने से राशन डीलर ने की आत्महत्या; प्रशासनिक व्यवस्था की खुली पोल

Johar News Times
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पुराना नकाटी के राशन डीलर मृणाल कांति रजक की आत्महत्या ने सरकारी खाद्य आपूर्ति व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। परिजनों का स्पष्ट आरोप है कि लंबे समय से कमीशन राशि का भुगतान नहीं होने के कारण वे आर्थिक तंगी और गहरे मानसिक दबाव में थे, जिससे परेशान होकर उन्होंने यह कदम उठाया। मृणाल कांति रजक न सिर्फ राशन डीलर थे, बल्कि फेयर प्राइस शॉप डीलर्स एसोसिएशन के सचिव भी थे।

उनकी मौत के बाद क्षेत्र के राशन डीलरों में आक्रोश फैल गया है और प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है।

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“कमीशन नहीं तो दुकान कैसे चले” डीलरों में आक्रोश

डीलरों का कहना है कि महीनों तक कमीशन भुगतान लंबित रहने से दुकानों का संचालन मुश्किल हो गया है। कई डीलर उधार और कर्ज लेकर किसी तरह व्यवस्था चला रहे हैं, लेकिन लगातार आर्थिक दबाव अब मानसिक तनाव में बदलता जा रहा है। इससे पहले हुलूंग क्षेत्र के एक डीलर ने भी कमीशन नहीं मिलने से नाराज होकर इस्तीफा देकर राशन दुकान सरेंडर कर दी थी। अब मृणाल कांति रजक की मौत ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।

प्रशासन का आश्वासन

मामले पर उपायुक्त ने कहा है कि राशन डीलरों के बकाया कमीशन भुगतान की प्रक्रिया तेज करने का निर्देश दिया गया है और लंबित राशि का जल्द भुगतान कराया जाएगा।

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वहीं जिला आपूर्ति पदाधिकारी (डीएसओ) जुल्फीकार अंसारी ने बताया कि घाटशिला के 84 राशन डीलरों को दिसंबर 2025 तक का भुगतान कर दिया गया है। हालांकि दिसंबर 2024 से मार्च 2025 तथा जनवरी से अप्रैल 2026 तक कुल आठ माह का कमीशन अभी भी लंबित है और भुगतान प्रक्रिया में है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिला स्तर से रिपोर्ट समय पर रांची भेज दी जाती है, लेकिन भुगतान विभागीय स्तर से होता है।

डेढ़ रुपए प्रति किलो कमीशन पर टिका सिस्टम

राशन डीलरों को प्रति किलो अनाज वितरण पर मात्र 1.50 रुपये कमीशन मिलता है। कार्डधारियों को जितना अधिक अनाज वितरित होता है, उसी आधार पर भुगतान तय होता है। कोई निश्चित मासिक वेतन नहीं दिया जाता। ऐसे में भुगतान में देरी सीधे उनकी आजीविका को प्रभावित करती है।

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अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या वर्षों से चली आ रही व्यवस्था की सुस्ती और लापरवाही ने एक और जान ले ली?

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