सरायकेला/चांडिल: दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी और गज परियोजना में पिछले तीन से चार दशकों से कार्यरत दैनिक वेतनभोगी मजदूर आज भी नियमितीकरण, सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक वेतन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। 1986 से जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा में लगे स्थानीय आदिवासी मजदूरों का आरोप है कि विभाग ने 35-38 साल की सेवा के बावजूद उन्हें अब तक कुशल, अर्द्धकुशल या अतिकुशल श्रेणी में शामिल नहीं किया।
मजदूर नेताओं के अनुसार, 1986, 1988 और 1990 के दौरान दलमा क्षेत्र के स्थानीय युवाओं को दैनिक मजदूर के रूप में बहाल किया गया था। उस समय उन्हें 650 से 935 रुपये मासिक मजदूरी मिलती थी। सीमित संसाधनों के बावजूद मजदूर जंगलों में गश्ती, ट्रैक रखरखाव, वन्यजीव निगरानी और सुरक्षा का कार्य करते थे। पुराने मजदूर बताते हैं कि उस दौर में दलमा के जंगलों में रॉयल बंगाल टाइगर, जंगली कुत्ते, भालू, हाथी, लकड़बग्घा और गिद्ध जैसे वन्यजीव बड़ी संख्या में मौजूद थे।
नियमितीकरण की मांग को लेकर ‘दलमा दैनिक वेतनभोगी मजदूर संघ’ ने 2013 में झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मजदूरों का दावा है कि अदालत से उनके पक्ष में आदेश भी मिला, लेकिन वन विभाग ने उसे लागू नहीं किया। बाद में विभाग द्वारा एलपीए दायर किए जाने के बाद मामला और लंबा खिंच गया।

वर्तमान में दलमा में करीब 50 दैनिक मजदूर कार्यरत हैं। ये मजदूर माकुलाकोचा चेकनाका, जंगल सफारी, एलिफेंट ट्रैकिंग, गेस्ट हाउस, मृग रेस्क्यू सेंटर और हाथियों की देखरेख जैसे महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। मजदूरों का आरोप है कि उन्हें प्रतिदिन 422 रुपये मजदूरी मिलती है, लेकिन भुगतान केवल 26 दिनों का किया जाता है, जबकि काम पूरे 30 दिन कराया जाता है।
मजदूरों ने सरकार से नियमितीकरण, पेंशन, ग्रेच्युटी, पीएफ और हाईकोर्ट आदेश लागू करने की मांग की है। संघ ने चेतावनी दी है कि मांगें पूरी नहीं होने पर फिर आंदोलन शुरू किया जाएगा।
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