पूर्वी सिंहभूम जिले के बहरागोड़ा प्रखंड में सुवर्णरेखा नदी किनारे बसे गांवों के किसान सिंचाई व्यवस्था ठप होने के कारण भारी परेशानी झेल रहे हैं। कभी सुवर्णरेखा के पानी से लहलहाने वाले खेत अब बारिश के भरोसे हैं। वर्षों से बंद पड़ी उद्भव (लिफ्ट) सिंचाई योजनाओं के कारण किसान निजी मोटर और बोरिंग से महंगा पानी खरीदकर खेती करने को मजबूर हैं।
प्रखंड के मधुआबेड़ा, चड़कमारा, बामडोल, गोहालडीहा, जेनाडीहा और पाथरी समेत दर्जनों गांवों में इन दिनों किसान सब्जी खेती की तैयारी में जुटे हैं। इस इलाके में करीब 2000 बीघा जमीन पर भिंडी, डींगला, करेला, खीरा समेत कई सब्जियों की खेती होती है। खेत तैयार हैं और बीज भी बोने के लिए तैयार हैं, लेकिन किसानों की नजर अब समय पर होने वाली बारिश पर टिकी हुई है। किसानों का कहना है कि यदि समय पर बारिश नहीं हुई तो पूरी फसल प्रभावित हो सकती है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सुवर्णरेखा रिवर जैसी बड़ी नदी क्षेत्र से गुजरती है, लेकिन सिंचाई की स्थायी व्यवस्था नहीं होने से किसान पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कई किसान निजी सबमर्सिबल पंप और बोरिंग से प्रति घंटे 100 रुपये देकर पानी खरीद रहे हैं, जिससे खेती की लागत लगातार बढ़ रही है।
स्थानीय किसानों का कहना है कि वर्षों से बंद पड़ी लिफ्ट इरिगेशन योजनाओं को दोबारा चालू करने की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई। किसानों के मुताबिक हर चुनाव में सिंचाई का मुद्दा उठता है, लेकिन समस्या जस की तस बनी रहती है। उनका कहना है कि अगर इन योजनाओं को फिर से शुरू कर दिया जाए तो हजारों किसानों को राहत मिलेगी और क्षेत्र की खेती की तस्वीर बदल सकती है। स्थानीय लोगों के अनुसार 1990 के दशक तक बहरागोड़ा विधानसभा क्षेत्र में सुवर्णरेखा नदी और अन्य जल स्रोतों के किनारे दो दर्जन से अधिक लिफ्ट इरिगेशन योजनाएं संचालित थीं। लघु सिंचाई विभाग के अधीन चलने वाली इन योजनाओं के जरिए पंप हाउस से पाइपलाइन द्वारा खेतों तक पानी पहुंचाया जाता था, जिससे हजारों एकड़ जमीन की सिंचाई होती थी। लेकिन वर्ष 1995 के आसपास अधिकांश योजनाएं धीरे-धीरे बंद हो गईं।
आज चाकुलिया के श्यामसुंदरपुर, बहरागोड़ा के गुहियापाल, मधुआबेड़ा, बामडोल, डोमजुड़ी और जामशोला समेत कई इलाकों में बंद पड़े पंप हाउस और जर्जर पाइपलाइनें सरकारी उपेक्षा की कहानी बयां कर रही हैं। रखरखाव के अभाव में पूरी व्यवस्था खंडहर में बदल चुकी है, जबकि किसान आज भी बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
