इंस्टाग्राम स्क्रॉल करते हुए क्या आपको भी लगता है कि आपकी बीमारी का इलाज डॉक्टर के पास नहीं, बल्कि किसी ‘हेल्थ इन्फ्लुएंसर’ की 60 सेकंड की रील में है? अगर हाँ, तो सावधान हो जाइए। ‘आदिवासी हेयर ऑयल’ के चमत्कारी दावों से लेकर बिना सिर-पैर के ‘सनस्क्रीन से कैंसर’ होने जैसे भ्रामक वीडियोज तक, सोशल मीडिया पर सेहत के नाम पर अज्ञानता का एक खतरनाक खेल चल रहा है।
डिजिटल दुनिया के इस छलावे और इसके पीछे के कड़वे सच को लेकर पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स ने कई महत्वपूर्ण चेतावनियाँ जारी की हैं। आइए समझते हैं कि डिजिटल वर्ल्ड की ‘हाइप’ और असली ‘हेल्थ’ में क्या अंतर है।
‘लाइक और व्यूज’ के चक्कर में सेहत से खिलवाड़: बड़े फेक दावे
आजकल सोशल मीडिया पर विटामिन सप्लीमेंट्स, इम्युनिटी बूस्टर पाउडर, शुगर-फ्री स्वीटनर्स और लो-कैलोरी स्नैक्स के फायदों की बाढ़ आई हुई है।
- चमत्कारी तेल और प्रोडक्ट्स: कुछ समय पहले ‘आदिवासी हेयर ऑयल’ को सेलिब्रिटीज से लेकर व्लॉगर्स तक सबने प्रमोट किया, लेकिन हकीकत में इस्तेमाल करने वालों को सिर्फ निराशा हाथ लगी।
- वैज्ञानिक आधारहीन दावे: इंटरनेट पर ऐसे वीडियोज भी मौजूद हैं जो दावा करते हैं कि ‘सनस्क्रीन से कैंसर होता है’ या ‘निकोटीन अल्जाइमर को ठीक कर सकता है’। ऐसे दावों को मिलियंस में व्यूज मिलते हैं, जबकि डॉक्टरों की वैज्ञानिक बातें लोगों को ‘बोरिंग’ लगने लगती हैं।
क्यों इतने प्रभावी साबित होते हैं ये इन्फ्लुएंसर्स?
- फर्जी डिग्रियां और बायो: इनमें से ज्यादातर क्रिएटर्स डॉक्टर, डेंटिस्ट या नर्स नहीं होते। ये अपनी बायो में खुद को डाइट कोच, लाइफ कोच या फिटनेस एक्सपर्ट लिखकर लोगों को गुमराह करते हैं।
- निजी अनुभव बनाम मेडिकल फैक्ट: किसी इन्फ्लुएंसर का वजन कम होना या किसी बीमारी से ठीक होना उसका निजी अनुभव हो सकता है, लेकिन वह हर किसी की बॉडी टाइप और परिस्थिति पर लागू नहीं होता।
एलोपैथी के खिलाफ फैलाया जा रहा है अविश्वास
चिंता की बात यह है कि कई इन्फ्लुएंसर्स घरेलू नुस्खों, प्राचीन ज्ञान और सांस्कृतिक गौरव की आड़ लेकर आधुनिक चिकित्सा (एलोपैथी) के प्रति लोगों के मन में संदेह पैदा कर रहे हैं। इससे एक ऐसा इकोसिस्टम बन रहा है जहाँ लोग खुद से ही दवाएं (ओवर द काउंटर सप्लीमेंट्स) खरीद रहे हैं, जिसका शरीर पर बेहद गंभीर और जानलेवा दुष्प्रभाव हो सकता है।
मानसिक सेहत पर भी पड़ रहा है बुरा असर: एक्सपर्ट की राय
ऑनलाइन सलाह को केवल सामान्य जानकारी मानें, इलाज नहीं।
डॉ. ज्योति मिश्रा बताती हैं कि इंटरनेट पर मिलने वाली अधूरी या गलत सलाह लोगों में डर, चिंता और भ्रम बढ़ा रही है। सोशल मीडिया पर दिखने वाली ‘परफेक्ट लाइफ’ से लोग खुद की तुलना करने लगते हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास गिरता है और तनाव बढ़ता है। हर व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक स्थिति अलग होती है, इसलिए समाधान भी अलग होना चाहिए।
इंटरनेट पर सही जानकारी खोजने का सही तरीका क्या है?
अगर आप किसी वजह से तुरंत डॉक्टर के पास नहीं जा पा रहे हैं, तो रील्स देखने के बजाय इन सुरक्षित विकल्पों को चुनें:
- टेलीहेल्थ (Telehealth) अपनाएं: घर बैठे वीडियो कॉल या चैट के जरिए प्रमाणित मेडिकल एक्सपर्ट्स से सलाह लें। यह सुरक्षित भी है और किफायती भी।
- विश्वसनीय वेबसाइट्स: सही डेटा और फैक्ट्स के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) या प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थानों की आधिकारिक वेबसाइट्स/ऐप्स की मदद लें।
- डिजिटल डिटॉक्स: अगर तनाव, उदासी या नींद की कमी लगातार बनी हुई है, तो स्क्रीन से ब्रेक लें, परिवार के साथ समय बिताएं और प्रमाणित मनोवैज्ञानिक से संपर्क करें।
सोशल मीडिया पर कुछ भी देखने से पहले ये 4 बातें जरूर सोचें:
- योग्यता जांचें: क्या जानकारी देने वाले इन्फ्लुएंसर के पास कोई वैध मेडिकल डिग्री है?
- मूल स्रोत (Source) खोजें: इस दावे का वैज्ञानिक आधार क्या है और इसका सोर्स क्या है?
- दोनों पहलू देखें: किसी भी स्वास्थ्य संबंधी दावे पर तुरंत भरोसा करने से पहले उसके नुकसानों पर भी विचार करें।
- शेयर करने से पहले सोचें: क्या इस रील या मैसेज को आगे फॉरवर्ड करने से किसी का नुकसान हो सकता है?
