सरायकेला: पेसा झारखंड नियमावली 2025 के कुछ प्रावधानों का विरोध करते हुए पारंपरिक ग्राम सभा मंच, सरायकेला-खरसावां के प्रतिनिधियों ने उपायुक्त को ज्ञापन सौंपा। मंच के प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि नियमावली के कई प्रावधान पेसा कानून 1996 की मूल भावना के विपरीत हैं और आदिवासी स्वशासन व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं।
मंच के राजेश मुंडरी, मालती हांसदा, मोती मुंडा, सुरेश चंद्र सोय, सुखराम गुंडा, श्यामल मार्डी और दिवाकर सोरेन समेत अन्य प्रतिनिधियों ने विशेष रूप से पारंपरिक ग्राम सभा में पंचायत सचिव जैसे सरकारी कर्मी को सचिव नियुक्त किए जाने के प्रावधान पर आपत्ति जताई। उनका कहना है कि यह व्यवस्था पारंपरिक ग्राम सभाओं की स्वायत्तता के खिलाफ है।
प्रतिनिधियों ने कहा कि सदियों से अस्तित्व में रही आदिवासी पारंपरिक ग्राम सभाओं को मान्यता देने के बजाय सरकारी अधिसूचना के माध्यम से नए सिरे से ग्राम सभाओं के गठन की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। उनके अनुसार यह कदम पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था और आदिवासी समुदाय के ऐतिहासिक संघर्षों एवं बलिदानों की विरासत को कमजोर करने का प्रयास है। ज्ञापन में यह भी सवाल उठाया गया कि जो व्यक्ति ग्राम सभा का सदस्य नहीं है, उसे ग्राम सभा के संचालन का अधिकार कैसे दिया जा सकता है। मंच का आरोप है कि ऐसे प्रावधानों के जरिए पारंपरिक ग्राम सभाओं को सरकारी नियंत्रण में लाने और आदिवासी स्वायत्तता को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। प्रतिनिधियों ने नियमावली के विवादित प्रावधानों पर पुनर्विचार करने की मांग की है।
