महुआ, चिरौंजी, केंदूपत्ता समेत वनोपज बेचकर चल रहा हजारों परिवारों का घर, उचित मूल्य नहीं मिलने से बढ़ी चिंता,
गुड़ाबांदा: गुड़ाबांदा प्रखंड के जंगल क्षेत्र में रहने वाले सबर और आदिवासी समुदाय के लिए जल, जंगल और जमीन आज भी जीवन और आजीविका का प्रमुख आधार हैं। यहां के हजारों परिवार, विशेषकर महिलाएं, जंगलों से मिलने वाले वनोपज पर निर्भर हैं। ग्रामीण सालभर महुआ, कोचड़ा, चिरौंजी, आंवला, बेर, जामुन, कटहल तथा साल और केंदू के पत्ते जैसे जंगली उत्पाद एकत्र कर बाजार में बेचते हैं। इसी से उनके परिवारों का भरण-पोषण होता है। हालांकि दिनभर की कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
ग्रामीणों का आरोप है कि सरकार या संबंधित विभाग की ओर से वनोपज के लिए कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य तय नहीं किए जाने के कारण स्थानीय बिचौलिए उनकी उपज औने-पौने दामों पर खरीद लेते हैं। इससे मेहनत का उचित लाभ उन्हें नहीं मिल पाता। ग्रामीणों ने मांग की है कि केंदूपत्ता की नियमित फाड़ी (खरीद केंद्र) खोली जाए, ताकि उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य मिल सके। उनका कहना है कि सरकार वन धन योजना और वनोपज आधारित आजीविका को बढ़ावा देने के दावे तो करती है, लेकिन इसका लाभ अब तक क्षेत्र के गरीब सबर और आदिवासी परिवारों तक नहीं पहुंच पाया है।
