धालभूमगढ़/पूर्वी सिंहभूम: झारखंड की विलुप्त होती पारंपरिक कला ‘पाइटकर पेंटिंग’ को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि जुड़ी है। पूर्वी सिंहभूम जिले के धालभूमगढ़ निवासी प्रसिद्ध पाइटकर कलाकार विजय को उनकी उत्कृष्ट कला के लिए राष्ट्रपति भवन से विशेष आमंत्रण प्राप्त हुआ है। यह सम्मान न केवल विजय के लिए, बल्कि पूरे झारखंड की सांस्कृतिक विरासत के लिए गौरव का क्षण है।

पारंपरिक कला के संरक्षण का मिला फल
विजय पिछले कई वर्षों से पाइटकर पेंटिंग की प्राचीन परंपरा को सहेजने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए समर्पित हैं। उनकी कलाकृतियों में झारखंड के आदिवासी जीवन, लोक गाथाओं, परंपराओं और प्रकृति के जीवंत रंगों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। राष्ट्रपति भवन से मिला यह बुलावा उनकी वर्षों की कड़ी मेहनत और कला के प्रति अटूट निष्ठा का राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च सम्मान है।
क्या है पाइटकर पेंटिंग?
पाइटकर पेंटिंग को भारत की सबसे पुरानी लोक कलाओं में से एक माना जाता है, जिसे ‘स्क्रॉल पेंटिंग’ भी कहते हैं। इस कला के माध्यम से कलाकार कहानियों को चित्रों के रूप में उकेरते हैं। विजय जैसे कलाकारों के प्रयासों से ही यह कला आज राष्ट्रीय फलक पर अपनी चमक बिखेर रही है।
इस खबर के बाद धालभूमगढ़ समेत पूरे जिले के कला प्रेमियों में हर्ष का माहौल है। विजय को इस उपलब्धि के लिए स्थानीय जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों ने भी बधाई दी है।
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