कब है जमाई षष्ठी? जानें दामाद के स्वागत और सुख-समृद्धि से जुड़े इस अनोखे पर्व का महत्व और विधि

अगर आपकी बेटी की नई-नई शादी हुई है, तो इस 20 जून को अपने जमाई राजा का स्वागत इस पारंपरिक अंदाज में करना न भूलें!

Johar News Times
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सनातन धर्म में बेटी, बहू और बच्चों के लिए कई व्रत-त्योहार मनाए जाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारी संस्कृति में दामाद (जमाई) के लिए भी एक विशेष पर्व समर्पित है? जी हां, इस खास त्योहार का नाम है जमाई षष्ठी। मुख्य रूप से बंगाली समाज में मनाया जाने वाला यह पर्व दामाद के प्रति सम्मान, सत्कार और प्यार जताने का एक बेहद खूबसूरत जरिया है।

आइए जानते हैं कि साल 2026 में जमाई षष्ठी कब है, इसका क्या महत्व है और इस दिन कौन सी खास परंपराएं निभाई जाती हैं।

जमाई षष्ठी 2026 की तारीख

बंगाली पंचांग और हिंदू कैलेंडर के अनुसार, यह उत्सव हर साल ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है।

इस साल जमाई षष्ठी 20 जून 2026, शुक्रवार को मनाई जाएगी।

क्यों मनाया जाता है जमाई षष्ठी का पर्व?

बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं में जमाई षष्ठी का एक बेहद खास और अहम स्थान है।

  • रिश्तों में मजबूती: यह पर्व दामाद को परिवार के एक अभिन्न सदस्य के रूप में सम्मान देने, उनकी खातिरदारी करने और ससुराल व दामाद के बीच के रिश्ते को और मजबूत करने के लिए मनाया जाता है।
  • संतान की लंबी आयु की कामना: इस दिन सास अपनी बेटी और दामाद के सुखी वैवाहिक जीवन, बच्चों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं।
  • प्रेम और आत्मीयता का प्रतीक: यह त्योहार केवल एक पारंपरिक रस्म नहीं है, बल्कि यह भागदौड़ भरी जिंदगी में परिवारों को करीब लाने और रिश्तों में मिठास घोलने का एक शानदार अवसर है।

कैसे मनाया जाता है यह त्योहार?

जमाई षष्ठी के दिन हर मायके (ससुराल) में एक उत्सव जैसा माहौल होता है। इस दिन निम्नलिखित रस्में निभाई जाती हैं:

  1. मां षष्ठी की पूजा: सुबह के समय सास स्नान करके विधि-विधान से मां षष्ठी की पूजा करती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां षष्ठी बच्चों की रक्षक और उनके सुख-स्वास्थ्य की अधिष्ठात्री देवी हैं।
  2. पूजा की थाल: पूजा के लिए एक विशेष थाल सजाई जाती है, जिसमें दूर्वा (घास), पान के पत्ते, सुपारी, ताजे फल, फूल और मीठा दही जैसी मांगलिक सामग्रियां रखी जाती हैं।
  3. पारंपरिक स्वागत और तिलक: जब बेटी और दामाद घर पहुंचते हैं, तो सास उनका पारंपरिक तरीके से स्वागत करती हैं। उन पर पवित्र जल का छिड़काव किया जाता है और आरती उतारी जाती है। इसके बाद दामाद के माथे पर दही का शुभ तिलक लगाया जाता है।
  4. बांधी जाती है ‘डोरा’: दामाद की लंबी उम्र और खुशहाली की कामना करते हुए उनके हाथ में एक पवित्र पीला धागा (जिसे डोरा कहा जाता है) बांधा जाता है। इन सभी रस्मों के बाद ही दामाद का गृह प्रवेश होता है।

स्वादिष्ट व्यंजनों और उपहारों से जताते हैं स्नेह

बंगाली संस्कृति में दामाद के स्वागत में भोजन का विशेष महत्व है। इस दिन सास अपने हाथों से दामाद की पसंद के कई तरह के बंगाली व्यंजन (जैसे- इलिश माछ, चिंगड़ी मलाई करी, लूची और तरह-तरह के मिश्ती) बनाती हैं।

  • मौसमी फलों का भोग: दामाद को आम, लीची, जामुन और मौसम के अन्य ताजे फलों का स्वाद चखाया जाता है।
  • उपहार देने की रस्म: इस खास मौके पर सास-ससुर द्वारा अपनी बेटी और दामाद को नए वस्त्र, आभूषण और अन्य उपहार भेंट कर आशीर्वाद दिया जाता है।

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