AI का ‘साइड इफेक्ट’: एक तरफ ताबड़तोड़ छंटनी, दूसरी तरफ कंपनियों का बजट हो रहा है फेल!

जिन दिग्गज कंपनियों (जैसे उबर और माइक्रोसॉफ्ट) ने बहुत पहले से AI को अपना लिया था, अब उन्हें इसका दूसरा पहलू समझ आने लगा है। AI इंसानों से भी ज्यादा महंगा साबित हो रहा है।

Johar News Times
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हर कर्मचारी के मुकाबले AI पर ₹6.4 लाख प्रति महीना खर्च कर रही हैं कंपनियां; लेकिन अब आने लगा है ‘यू-टर्न’, जानिए क्यों।

  • मशीनों का मोह: टेक कंपनियों में इंसानों की जगह AI टूल्स और क्लाउड सर्विस पर पानी की तरह बहाया जा रहा है पैसा।
  • बजट क्रैश: कई बड़ी कंपनियों का सालभर का AI बजट महज एक महीने में ही हो रहा है स्वाहा।
  • नौकरियों पर संकट: अमेरिका में 2026 में AI बना लेऑफ (छंटनी) की सबसे बड़ी वजह, मिड और एंट्री लेवल पर सबसे ज्यादा खतरा।

टेक वर्ल्ड में बड़ा बदलाव: इंसानों से हटाकर मशीनों पर फोकस

दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों में इस समय एक चौंकाने वाला ट्रेंड देखने को मिल रहा है। कंपनियां जहां एक तरफ कर्मचारियों की तेजी से छंटनी कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर भारी-भरकम निवेश कर रही हैं।

ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, कई कंपनियां अब हर कर्मचारी के मुकाबले हर महीने करीब 6.4 लाख रुपये ($7,500+) तक सिर्फ AI पर खर्च कर रही हैं। इस भारी-भरकम खर्च में AI टूल्स, क्लाउड सर्विस, डेटा प्रोसेसिंग और हैवी कंप्यूटिंग पावर की कॉस्ट शामिल है।

2026 में AI बना लेऑफ की सबसे बड़ी वजह

रिपोर्ट्स बताती हैं कि अमेरिका सहित ग्लोबल मार्केट में AI अब नौकरियों को निगलने का सबसे बड़ा कारण बन चुका है। साल 2026 में AI से जुड़ी छंटनी का आंकड़ा पिछले दो साल के कुल लेऑफ से भी ज्यादा हो चुका है। कंपनियों की सीधी रणनीति है— कम लोग और ज्यादा काम। इसके लिए स्टाफ की सैलरी का बजट सीधे AI इंफ्रास्ट्रक्चर में शिफ्ट किया जा रहा है।

क्यों AI पर दांव लगा रही हैं कंपनियां?

  • लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट: कंपनियों का मानना है कि AI सिस्टम बिना थके और बिना छुट्टी के लगातार काम कर सकता है।
  • कस्टमर सपोर्ट और डेटा: जहां पहले बड़ी-बड़ी टीमें लगती थीं, वहां अब अकेले AI चैटबॉट्स और डेटा एनालिसिस टूल्स काम संभाल रहे हैं।

नौकरियों पर असर: अब स्किल नहीं, ‘AI स्किल’ बचाएगी जॉब

इस बदलाव का सबसे घातक असर एंट्री लेवल और मिड लेवल के प्रोफेशनल्स पर पड़ रहा है। एक्सपर्ट्स का साफ कहना है कि आने वाले समय में केवल वही लोग रेस में टिक पाएंगे, जिन्हें AI टूल्स के साथ काम करना आता होगा।

पहले जिस प्रोजेक्ट के लिए 10 लोगों की जरूरत होती थी, अब वही काम AI की मदद से सिर्फ 2 से 3 लोग मिलकर कर रहे हैं। यानी नौकरियां पूरी तरह खत्म नहीं हो रही हैं, बल्कि काम करने का तरीका बदल रहा है।

लेकिन अब AI से परेशान भी होने लगी हैं कंपनियां!

कहानी में एक ट्विस्ट भी है। जिन दिग्गज कंपनियों (जैसे उबर और माइक्रोसॉफ्ट) ने बहुत पहले से AI को अपना लिया था, अब उन्हें इसका दूसरा पहलू समझ आने लगा है। AI इंसानों से भी ज्यादा महंगा साबित हो रहा है।

  • महीने भर में उड़ रहा साल का बजट: कॉर्पोरेट लेवल पर AI इस्तेमाल करने के लिए करोड़ों क्रेडिट्स की जरूरत होती है। भारी डेटा प्रोसेसिंग के कारण कंपनियों का सालभर का AI बजट महज एक महीने में खत्म हो रहा है।
  • क्या होगी इंसानों की वापसी?: एक्सपर्ट्स का मानना है कि AI का बिल देना अब कंपनियों के लिए भारी पड़ रहा है। जैसे-जैसे AI कंप्यूटिंग और महंगी होगी, कंपनियां कुछ ही सालों में फिर से इंसानों को तवज्जो देने और उन्हें हायर करने पर मजबूर हो सकती हैं।

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