देश की राजनीति में इस वक्त जबरदस्त उथल-पुथल देखने को मिल रही है, जिसका सीधा असर संसद के संख्या बल पर पड़ने की संभावना है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के भीतर उभरे आंतरिक असंतोष ने राष्ट्रीय राजनीति की सरगर्मियां बढ़ा दी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष में लग रही इस सेंध से आगामी मानसून सत्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को बहुत बड़ी बढ़त मिल सकती है।
महिला आरक्षण और परिसीमन बिल का रास्ता साफ?
विपक्षी एकजुटता में आ रही दरार के बीच यह कयास लगाए जा रहे हैं कि केंद्र सरकार को आगामी सत्र में बड़े संवैधानिक संशोधन विधेयकों को पारित कराने में आसानी होगी।
- यदि असंतुष्ट या बागी सांसद नया रुख अपनाते हैं, तो सरकार के लिए महत्वपूर्ण विधेयकों पर आवश्यक संख्या बल जुटाना बेहद आसान हो जाएगा।
- इस पूरे घटनाक्रम का सीधा असर महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे बड़े और ऐतिहासिक बिलों पर पड़ सकता है।
दो राज्यों में हलचल, दिल्ली में बढ़ा सियासी पारा
संसद के गणित में बदलाव के पीछे दो प्रमुख राज्यों के घटनाक्रम जिम्मेदार माने जा रहे हैं:
- तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसदों के पार्टी नेतृत्व से अलग रास्ता अपनाने की अटकलों ने सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
- उद्धव गुट के कुछ सांसदों की हालिया गतिविधियों और रुख को लेकर भी कयासों का बाजार गर्म है।
क्या कहता है संसद का समीकरण? किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए सदन में दो-तिहाई (2/3) बहुमत की आवश्यकता होती है। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए एनडीए इस जादुई आंकड़े के बेहद करीब पहुंचती दिखाई दे रही है। यदि क्षेत्रीय दलों और संभावित बागी सांसदों का परोक्ष या अपरोक्ष समर्थन मिलता है, तो सरकार के लिए राह बेहद आसान हो जाएगी।
अब ‘मानसून सत्र’ पर टिकीं सबकी निगाहें
अब देश के सभी राजनीतिक पंडितों और आम जनता की नजरें संसद के आगामी मानसून सत्र पर टिकी हैं। क्या विपक्ष इस बड़े झटके के बाद भी अपनी एकजुटता बचाए रखने में कामयाब होगा? या फिर यह असंतोष विपक्षी खेमे को और कमजोर करेगा? यह आने वाले कुछ दिनों में पूरी तरह साफ हो जाएगा, लेकिन फिलहाल इन घटनाक्रमों ने दिल्ली की सियासत को पूरी तरह गरमा दिया है।
