सरायकेला-खरसावां जिले के नीमडीह प्रखंड अंतर्गत लूपुंगडीह पंचायत की पहाड़धार खड़िया बस्ती में रहने वाले आदिम जनजाति समुदाय के लोगों की जिंदगी आज भी जंगल और अभावों के बीच गुजर रही है। दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी की तराई में बसे सबर और खड़िया परिवार बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य और सरकारी योजनाओं का लाभ आज भी इन गांवों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया है।
करीब दो महीने पहले जंगली हाथियों के झुंड ने रघुनाथ सबर का कच्चा घर तोड़ दिया था। घर में रखा अनाज भी हाथियों ने बर्बाद कर दिया। पीड़ित परिवार का कहना है कि घटना के बाद वन विभाग को सूचना दी गई, लेकिन अब तक मुआवजा नहीं मिला है। डर का आलम यह है कि परिवार रात में अपने घर में सोने की बजाय पास के स्कूल भवन में शरण लेने को मजबूर है।
बस्ती के अधिकांश परिवार जंगल से लकड़ी, साल पत्ता, दातून और कंदमूल इकट्ठा कर बाजार में बेचकर जीवन यापन करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गांव तक पक्की सड़क नहीं होने से बरसात में संपर्क पूरी तरह टूट जाता है। पीने के पानी के लिए लोग आज भी झरनों पर निर्भर हैं। बीमार पड़ने पर मरीज को अस्पताल पहुंचाना बड़ी चुनौती बन जाता है।
दूसरी ओर कई बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र और आधार कार्ड नहीं बनने से वे छात्रवृत्ति और अन्य सरकारी योजनाओं से वंचित हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन पर उपेक्षा का आरोप लगाते हुए कहा कि विकास योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित हैं।

इस मामले में नीमडीह बीडीओ ने कहा कि हाथी से हुए नुकसान की रिपोर्ट मंगाई गई है और वन विभाग से समन्वय कर मुआवजा दिलाने की प्रक्रिया तेज की जाएगी। वहीं डीसी सरायकेला ने कहा कि पीवीटीजी समुदाय के लिए संचालित योजनाओं का लाभ हर जरूरतमंद परिवार तक पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं।
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