विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर वन अधिकार समिति, डालापानी की ओर से स्थानीय फुटबॉल मैदान में एक ‘पर्यावरण संरक्षण संकल्प सभा’ का भव्य आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में पर्यावरण को बचाने और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने का संकल्प लिया गया।
मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित सामाजिक कार्यकर्ता सह ‘ग्रीन मैन’ मदन मोहन सोरेन ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि पर्यावरण का असली संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं या कागजी बहसों से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए हमें प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की जीवनशैली को अपनाना होगा।
आदिवासी संस्कृति ही पर्यावरण का असली मॉडल: ‘ग्रीन मैन’
मदन मोहन सोरेन ने आदिवासी जीवन दर्शन और प्रकृति के गहरे जुड़ाव को रेखांकित करते हुए कहा:
“आदिवासी समाज सदियों से जल, जंगल और जमीन के संरक्षण की परंपरा का निर्वहन करता आया है। आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, तब आदिवासी संस्कृति और परंपराओं से सीख लेने की सबसे ज्यादा जरूरत है।”
उन्होंने आगे कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति को महज एक उपभोग का ‘संसाधन’ नहीं, बल्कि अपनी ‘जीवनदाता’ मानता है। पेड़-पौधों, नदियों, पहाड़ों और जंगलों के प्रति आदर का भाव यहाँ की संस्कृति की नींव है। यही वजह है कि जहाँ भी स्थानीय समुदायों की भागीदारी रही है, वहाँ जंगल और जैव विविधता सबसे सुरक्षित रहे हैं।
जल, जंगल और ज़मीन को बचाने के लिए 4 बड़े सुझाव
संबोधन के दौरान सोरेन ने पर्यावरण को जन आंदोलन बनाने के लिए कुछ प्रमुख बातें सामने रखीं:
- समुदाय आधारित वन प्रबंधन को बढ़ावा दिया जाए।
- हर नागरिक को अधिक से अधिक पौधे लगाने चाहिए।
- दैनिक जीवन में प्लास्टिक के उपयोग को न्यूनतम स्तर पर लाना।
- आने वाली पीढ़ियों के लिए नदियों और तालाबों को बचाना।
ग्रामीणों के बीच हुआ पौधों का वितरण
इस जागरूकता सभा को केवल भाषणों तक सीमित न रखकर जमीनी स्तर पर भी लागू किया गया। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित ग्रामीणों के बीच विभिन्न प्रजातियों के पौधों का वितरण किया गया, ताकि लोग इन्हें अपने घरों और खेतों में लगा सकें।
इन दिग्गजों ने भी रखे अपने विचार
कार्यक्रम में सामाजिक कार्यकर्ता सुखलाल हंसदा, दुर्लभ बेसरा, किंकर महतो और बेको पंचायत के मुखिया चाम्पा माझी ने भी पर्यावरण और स्थानीय विकास पर अपने महत्वपूर्ण विचार साझा किए।
कार्यक्रम में मुख्य रूप से उपस्थित रहे: दामू प्रमाणिक, मधुसूदन दास, प्रभाकर महतो, सावित्री महतो, लीलावती महतो, मिनोति महतो, दुर्गी हांसदा, कविता महतो, सरस्वती महतो, टूसुमनी महतो, जगन्नाथ सोरेन, सुदर्शन सोरेन, नमिता महतो, भक्तिपद महतो, गुरुप्रसाद महतो और रबिन्द्र बेसरा समेत सैकड़ों ग्रामीण।
