भारत में दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (IBC) के माध्यम से देश की दिवाला व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव किया गया है। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य वित्तीय संकट से जूझ रही कंपनियों के समाधान के लिए एक एकीकृत, लेनदार-आधारित और समयबद्ध तंत्र तैयार करना था, जिससे पुराने जटिल और बिखरे हुए कानूनी ढांचे को एक साथ लाया जा सके।
बदलाव क्यों जरूरी था
पहले भारत में दिवाला समाधान की प्रक्रिया कई अलग-अलग कानूनों और एजेंसियों में बंटी हुई थी, जिससे मामलों में लंबी देरी, कम वसूली और अनिश्चित परिणाम सामने आते थे। इसी स्थिति को सुधारने के लिए IBC लाया गया, ताकि:
- समाधान प्रक्रिया समयबद्ध हो सके
- लेनदारों की वसूली बेहतर हो
- परिसंपत्तियों का मूल्य घटने से बचाया जा सके
- कंपनियों का पुनर्गठन या परिसमापन तेज और पारदर्शी हो
सुधार और परिणाम
इस संहिता ने वर्षों के दौरान वसूली तंत्र को मजबूत किया है और समाधान के परिणामों में सुधार किया है। मार्च 2026 तक स्वीकृत समाधान योजनाओं के माध्यम से लेनदारों ने लगभग 4.32 लाख करोड़ रुपये की वसूली की है।
आगे की दिशा
हालिया संशोधनों का उद्देश्य दिवाला समाधान और परिसमापन प्रक्रिया को और अधिक कुशल, पूर्वानुमेय और समाधान-केंद्रित बनाना है, ताकि पूरी प्रणाली अधिक प्रभावी और निवेश अनुकूल हो सके।
