ओडिशा, झारखंड और नई दिल्ली से आए संथाली मासिक समाचार पत्रिका ‘फागुन’ के एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मुलाकात की। प्रतिनिधि श्रीमती सुलोचना हांसदा के नेतृत्व में हुई इस मुलाकात के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने एनसीईआरटी द्वारा प्रकाशित संथाली पाठ्यपुस्तकों में देवनागरी लिपि के निरंतर उपयोग पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने मांग की कि संथाली भाषा की अपनी स्वदेशी, वैज्ञानिक और प्रामाणिक लिपि ‘ओलचिकी’ को तुरंत लागू किया जाए।
यह बैठक नई दिल्ली में आयोजित ओलचिकी लिपि के ऐतिहासिक शताब्दी समारोह (1925-2025) के सफल समापन के बाद माननीय राष्ट्रपति के साथ पहली आधिकारिक बातचीत थी। प्रतिनिधियों ने शताब्दी समारोह में मिले सहयोग और ओलचिकी लिपि के आविष्कारक पंडित रघुनाथ मुर्मू को दिए गए सम्मान के लिए राष्ट्रपति के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया।
प्रतिनिधिमंडल ने शैक्षणिक सत्र 2026-2027 से केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के पाठ्यक्रम में संथाली भाषा को शामिल करने के ऐतिहासिक फैसले के लिए केंद्र सरकार और राष्ट्रपति का धन्यवाद किया। उन्होंने इसे राष्ट्रीय स्तर पर संथाली भाषा के विकास और विस्तार के लिए एक बड़ा मील का पत्थर बताया। इस खास मौके पर श्रीमती सुलोचना हांसदा ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को संथाली सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक के रूप में एक पारंपरिक ‘झाल साड़ी’ भेंट की।
- ज्ञापन में जोर दिया गया कि ओलचिकी संथाली भाषा के लिए वैज्ञानिक रूप से डिजाइन की गई और सांस्कृतिक रूप से प्रामाणिक लेखन प्रणाली है।
- यह लिपि लंबे समय से ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम और झारखंड के स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और साहित्यिक प्रकाशनों में सफलतापूर्वक उपयोग की जा रही है।
- प्रतिनिधियों ने कहा कि एनसीईआरटी और सीबीएसई द्वारा देवनागरी लिपि में संथाली किताबों का प्रकाशन संथाली भाषी समुदायों की भाषाई पहचान और उनके शैक्षणिक अधिकारों को कमजोर करता है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर सिर्फ ओलचिकी लिपि को ही अपनाया जाए।
मुलाकात के दौरान संथाली भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के उद्देश्य से भविष्य की पहलों पर भी गंभीर चर्चा हुई। प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में संथाली परंपराओं, रीति-रिवाजों और पहचान को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में “जाहेर गढ़” स्थापित करने का प्रस्ताव राष्ट्रपति के समक्ष रखा।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने संथाली भाषा, साहित्य और ओलचिकी लिपि को बढ़ावा देने में शामिल विभिन्न संगठनों के सामूहिक प्रयासों की सराहना की और समुदाय की भाषाई विरासत को संरक्षित करने के प्रति अपने समर्थन की बात कही।
इस ऐतिहासिक मुलाकात के दौरान प्रतिनिधिमंडल में मुख्य रूप से मंगत मुर्मु, अनूप माझी, डॉ. रजनीकांत मांडी, डॉ. फुदन सोरेन, सोमनाथ हांसदा, सुलोचना हांसदा, कबिता हांसदा, करुणाकर हांसदा, सिंगराय मुर्मु, रतिकान्त मुर्मु, चूड़ामणि मुर्मु, रायमोहन टुडू, रीता टुडू, जयश्री टुडू, नूनाराम हांसदा और बेलारानी हांसदा शामिल थे।
