पूर्वी सिंहभूम जिले में अबुआ आवास, प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) और पीएम जनमन आवास योजनाओं की प्रगति बेहद धीमी पड़ गई है। राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी “अबुआ आवास” योजना के तहत हजारों आवास स्वीकृत किए गए थे, लेकिन निर्माण कार्य की रफ्तार बेहद सुस्त रहने से बड़ी संख्या में लाभुक अब भी अधूरे मकानों में रहने को मजबूर हैं। जिला प्रशासन की रिपोर्ट के अनुसार जिले में कुल 29,814 अबुआ आवास स्वीकृत किए गए थे, लेकिन अब तक केवल 3,959 आवास ही पूर्ण हो पाए हैं।
जिले के 11 प्रखंडों में आवास निर्माण की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। आंकड़ों के मुताबिक, बोड़ाम में 1,739 स्वीकृत आवासों में 592 पूरे हुए हैं, जबकि पटमदा में 3,270 में से केवल 763 आवास ही बन सके हैं। धालभूमगढ़ में 2,072 में 426, बहरागोड़ा में 4,224 में मात्र 562, घाटशिला में 3,477 में 490, चाकुलिया में 3,669 में 414 और मुसाबनी में 1,368 आवासों में सिर्फ 127 आवास पूर्ण हुए हैं।
सबसे खराब स्थिति पोटका और गुड़ाबांदा प्रखंड की बताई जा रही है। पोटका में 6,736 स्वीकृत आवासों में केवल 56 पूर्ण हुए हैं, जबकि गुड़ाबांदा में 1,158 आवासों में मात्र 46 मकान ही तैयार हो सके हैं। कई लाभुकों ने पहली, दूसरी और तीसरी किस्त मिलने के बावजूद निर्माण कार्य पूरा नहीं किया है। इस मामले में गुड़ाबांदा के बीडीओ डांगुर कोड़ाह ने बताया कि पंचायतवार लाभुकों को नोटिस जारी किया गया है। उन्होंने कहा कि जिन लाभुकों ने राशि लेने के बाद भी मकान निर्माण पूरा नहीं किया है, उन्हें एक सप्ताह का समय दिया गया है। इसके बाद प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी। बीडीओ ने बताया कि उन्होंने स्वयं कई आवासों का निरीक्षण किया है।
ग्रामीणों और लाभुकों का कहना है कि निर्माण सामग्री की लगातार बढ़ती कीमतें योजना की सबसे बड़ी बाधा बन गई हैं। वर्तमान में बालू की कीमत करीब 2,300 रुपये प्रति ट्रैक्टर तक पहुंच गई है, जबकि सरकारी दर 1,200 से 1,300 रुपये तय है। इसके अलावा ईंट, सीमेंट, सरिया और चिप्स के दामों में भी भारी वृद्धि हुई है। ट्रांसपोर्टिंग सहित एक ईंट की कीमत 12 से 25 रुपये तक पड़ रही है। वहीं सरिया करीब 60 हजार रुपये प्रति टन और सीमेंट लगभग 310 रुपये प्रति बोरी बिक रहा है। चिप्स की कीमत भी 8 से 10 हजार रुपये प्रति ट्रैक्टर तक पहुंच गई है।
इसी तरह प्रधानमंत्री आवास योजना और विशेष रूप से सबर जनजाति के लिए संचालित पीएम जनमन आवास योजना की प्रगति भी संतोषजनक नहीं है। कई लाभुक आर्थिक तंगी और महंगी निर्माण सामग्री के कारण मकान अधूरा छोड़ने को मजबूर हैं। लाभुकों का कहना है कि वर्तमान बाजार दर के मुकाबले सरकारी सहायता राशि काफी कम है, जिससे मकान निर्माण पूरा कर पाना मुश्किल हो रहा है। अब जिले के लोगों की नजर प्रशासन और सरकार पर टिकी है कि योजनाओं की धीमी रफ्तार को तेज करने और लाभुकों को राहत देने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।
