विशेष रिपोर्ट: चांडिल डैम क्षेत्र में हाथियों के आतंक का असली गुनहगार कौन— वन विभाग या ₹8 करोड़ महीना कमाने वाली स्वर्णरेखा परियोजना?

"करोड़ों का राजस्व फिर भी जनता बेबस: चांडिल डैम क्षेत्र में हाथी के आतंक पर बड़ा खुलासा!"

Johar News Times
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सरायकेला-खरसावां जिले का चांडिल डैम क्षेत्र पिछले 20 दिनों से जंगली हाथियों के खौफनाक आतंक के साये में जीने को मजबूर है। बहुउद्देशीय परियोजना के 22 हजार हेक्टेयर जलाशय से सटे मैसाड़ा और कालीचामदा गांवों में रातें दहशत में कट रही हैं। ग्रामीण और जनप्रतिनिधि लगातार वन विभाग पर हाथी भगाने का दबाव बना रहे हैं, लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी नतीजा शून्य है।

अब इस त्रासदी के बीच एक बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है— हाथी समस्या का असली जिम्मेदार कौन है? सीमित संसाधनों से जूझ रहा वन विभाग या अरबों का राजस्व डकारने वाली स्वर्णरेखा परियोजना?

दलमा सेंचुरी से क्यों पलायन कर रहे हैं गजराज? वन विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, दलमा वन्य प्राणी आश्रयणी में भोजन और पानी की किल्लत के कारण हाथियों के झुंड चांडिल वन क्षेत्र के चारों प्रखंडों के जंगलों में डेरा डाल रहे हैं। चांडिल डैम और जलाशय क्षेत्र में हाथियों को भरपूर पानी और भोजन आसानी से मिल जाता है। यही वजह है कि शाम ढलते ही हाथियों का झुंड गांवों में घुसकर घरों को तोड़ रहा है और अनाज चट कर जा रहा है।

नाकाम साबित हो रही QRT टीम की मेहनत पिछले दिनों वन विभाग ने दो-दो क्विक रिस्पॉन्स टीम को मैदान में उतारा। पूरी रात ग्रामीणों के सहयोग से हाथी को खदेड़ते हुए “ईचागढ़ पुराना थाना बोर्डिंग स्कूल” तक पहुंचाया भी गया। लेकिन रात करीब 2:00 बजे, ईचागढ़ में एक युवक के अति-उत्साह और लापरवाही के कारण नहर पार करते समय हाथी रास्ता भटक गया और वापस मैसाड़ा गांव लौट आया। वन विभाग का कहना है कि वे हाथियों को दूर तक खदेड़ते हैं, लेकिन अनुकूल माहौल होने के कारण हाथी बार-बार इसी इलाके में लौट आते हैं।

कटघरे में स्वर्णरेखा परियोजना: ₹8 करोड़ मासिक राजस्व, फिर भी विस्थापितों के घाव पर नमक!

स्थानीय प्रबुद्ध वर्ग और ग्रामीणों का स्पष्ट मानना है कि इस मानव-हाथी संघर्ष की असली जड़ वन विभाग नहीं, बल्कि चांडिल डैम है।

  • डैम के निर्माण से हाथियों का सदियों पुराना प्राकृतिक कॉरिडोर और आवास पूरी तरह नष्ट हो गया।
  • आंकड़ों के मुताबिक, टाटा कंपनी स्वर्णरेखा परियोजना को पानी के एवज में हर महीने 8 करोड़ रुपये का भारी-भरकम राजस्व देती है।
  • इसके बावजूद, परियोजना प्रबंधन द्वारा विस्थापित और प्रभावित क्षेत्रों में हाथी समस्या के समाधान या ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए एक रुपया भी खर्च नहीं किया जाता।

वन विभाग का घेराव तो हुआ, स्वर्णरेखा कार्यालय कब जाएंगे ग्रामीण? हाथी के आतंक से त्रस्त ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने शुक्रवार को चांडिल वन क्षेत्र पदाधिकारी (RO) कार्यालय का जोरदार घेराव किया। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब तबाही की असली जड़ डैम और परियोजना प्रबंधन की लापरवाही है, तो क्या ग्रामीण और नेता उसी सख्ती के साथ स्वर्णरेखा परियोजना कार्यालय का घेराव करने की हिम्मत जुटा पाएंगे?

ईचागढ़ के 3 तीखे सवाल— जिनका जवाब मिलना जरूरी है:

  1. अगर डैम बनने के कारण हाथियों का रूट बदला और गांवों में तबाही बढ़ी, तो इसकी भरपाई और सुरक्षा का जिम्मा सिर्फ सीमित संसाधनों वाले वन विभाग पर क्यों मढ़ा जा रहा है?
  2. हर महीने 8 करोड़ रुपये का राजस्व वसूलने वाली स्वर्णरेखा परियोजना आखिर विस्थापित क्षेत्रों में मानव-हाथी संघर्ष रोकने के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाती?
  3. क्या क्षेत्र के जनप्रतिनिधि और ग्रामीण परियोजना प्रबंधन की इस निष्क्रियता के खिलाफ भी उसी आक्रामकता से जवाब मांगेंगे, जैसी वन विभाग से मांगते हैं?

पटाखे, टॉर्च और QRT टीम के भरोसे हाथियों को कुछ घंटों के लिए तो डराया जा सकता है, लेकिन यह इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। जब तक हाथियों के नष्ट हो चुके आवास की क्षतिपूर्ति और वैकल्पिक कॉरिडोर पर काम नहीं होगा, तब तक यह दहशत जारी रहेगी। अब देखना यह है कि प्रशासन और सरकार इस समस्या की असली जड़ की जवाबदेही कब तय करती है।

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