दलमा सेंदरा पर्व: “जंगल हमारा धर्म है, व्यापार नहीं” – दलमा राजा ने वन विभाग और इको-सेंसिटिव जोन के खिलाफ खोला मोर्चा

Johar News Times
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जमशेदपुर/दलमा: दलमा गुरु सेंद्र पर्व के अवसर पर आदिवासियों के पारंपरिक गुरु ‘दलमा राजा’ ने जल, जंगल और जमीन के अधिकारों को लेकर हुंकार भरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आदिवासियों के लिए जंगल कोई पर्यटन स्थल या व्यापार का केंद्र नहीं, बल्कि उनकी आस्था और अस्तित्व का आधार है। इस दौरान प्रशासन के साथ हुए समझौतों और इको-सेंसिटिव जोन के नाम पर आदिवासियों को विस्थापित करने की साजिशों पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई।


1. प्रशासन से आर-पार का समझौता: “तीर-धनुष हमारी पहचान, इसे कोई छीन नहीं सकता”

सेंद्र पर्व के दौरान अक्सर प्रशासन और आदिवासियों के बीच होने वाले टकराव पर इस बार स्थिति स्पष्ट कर दी गई है। दलमा राजा ने बताया कि वन विभाग और जिला प्रशासन के साथ ‘फेस टू फेस’ वार्ता हो चुकी है।

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  • पारंपरिक हथियारों पर सहमति: आदिवासी समाज ने साफ कर दिया है कि उनके पारंपरिक तीर-धनुष उनकी धार्मिक आस्था का हिस्सा हैं। वन विभाग इस पर्व के दौरान न तो किसी का तीर-धनुष छीनेगा और न ही किसी सेंद्र वीर (शिकारी) को जेल भेजेगा।
  • भयमुक्त सेंद्र: दलमा राजा ने दूर-दराज से आने वाले आदिवासियों से अपील की है कि वे प्रशासन या वन विभाग की टीम को देखकर डरें नहीं और न ही भागें। उन्होंने कहा, “जंगल में अपना धर्म मनाना गैरकानूनी नहीं है, यह हमारा संवैधानिक अधिकार है।”

2. पर्यटन और पक्के निर्माण पर चिंता: “इंसानों की चकाचौंध से नाराज हो रहे हैं देवी-देवता”

दलमा राजा ने पहाड़ पर हो रहे कंक्रीट के अतिक्रमण और व्यावसायिक गतिविधियों पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने आधुनिक विकास के मॉडल को जंगल के लिए विनाशकारी बताया:

  • वन देवी की नाराजगी: उन्होंने कहा कि जंगल में रात को तेज लाइटें लगाना और शोर-शराबा करना प्रकृति के विरुद्ध है। जहां इंसानों का दखल बढ़ता है, वहां से वन देवी और जंगली जानवर पलायन कर जाते हैं।
  • अवैध निर्माण का विरोध: “वन विभाग कहता है कि जंगल में सड़क नहीं बननी चाहिए, तो फिर दलमा की ऊंचाइयों पर बड़े-बड़े पक्के भवन और मंदिर कैसे बन गए?” राजा ने सवाल उठाया कि जब पूर्वजों के समय से चले आ रहे रास्तों को ‘अवैध’ बताया जाता है, तो पर्यटन के नाम पर हुए निर्माण ‘वैध’ कैसे हो गए?
  • धार्मिक व्यापार: पहाड़ों पर स्थित मंदिरों में डोनेशन और चंदे के नाम पर हो रही वसूली पर भी उन्होंने आपत्ति जताई और इसे व्यापार करार दिया।
"जंगल हमारा धर्म है, व्यापार नहीं": वन विभाग की नीतियों और व्यावसायिक अतिक्रमण के खिलाफ गरजे दलमा राजा।

3. इको-सेंसिटिव जोन का विरोध: “मूलवासियों को उजाड़ने की साजिश”

सबसे बड़ा हमला ‘इको-सेंसिटिव जोन’ की नीति पर किया गया। दलमा राजा ने इसे आदिवासियों और मूलवासियों को उनके घर से बेदखल करने का एक हथियार बताया।

  • विस्थापन के खिलाफ एकजुटता: उन्होंने झारखंड, बंगाल, उड़ीसा और बिहार के आदिवासियों को सतर्क रहने की चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि इको-सेंसिटिव जोन का उद्देश्य जंगल की रक्षा करना नहीं, बल्कि वहां के संसाधनों पर कब्जा करना और मूल निवासियों को भगाना है।
  • दलमा सेंद्र समिति का समर्थन: उन्होंने ऐलान किया कि यदि किसी भी गांव या बस्ती को इस जोन के नाम पर परेशान किया जाता है, तो ‘दलमा सेंद्र समिति’ और पूरा आदिवासी समाज उनके साथ खड़ा होगा।

निष्कर्ष: दलमा राजा का यह बयान स्पष्ट करता है कि आदिवासी समाज अब अपनी परंपराओं के साथ-साथ अपने कानूनी अधिकारों के प्रति भी सजग है। उन्होंने संदेश दिया कि “आदिवासी है तो जंगल है, और जंगल है तो जानवर हैं।”

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