सेंदरा 2026: जहाँ पति के लिए पत्नियां बन जाती हैं ‘विधवा’, दलमा की पहाड़ियों पर आस्था और जान की बाजी

Johar News Times
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जमशेदपुर | डिजिटल डेस्क झारखंड की गौरवशाली आदिवासी संस्कृति और प्रकृति के प्रति अटूट आस्था का महापर्व ‘सेंदरा’ (शिकार पर्व) इस वर्ष 27 अप्रैल को मनाया जा रहा है। जमशेदपुर के ऐतिहासिक दलमा पहाड़ की तराई में आस्था, साहस और परंपरा का एक ऐसा संगम उमड़ा है, जो आधुनिक दौर में भी रोंगटे खड़े कर देता है। यह पर्व केवल शिकार नहीं, बल्कि एक कठिन तपस्या और जंगल की विरासत को बचाने का संकल्प है।


दहला देने वाली परंपरा: जब सुहागन मिटाती है अपना सिन्दूर

सेंदरा की सबसे भावुक और हैरान कर देने वाली रस्म घर की दहलीज पर निभाई जाती है। जब शिकारी सेंदरा के लिए घर से निकलता है, तो गांव का नजारा किसी युद्ध पर जाने वाले योद्धा जैसा होता है।

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  • विदाई की अनूठी रस्म: सेंदरा पर जाने वाले शिकारी की पत्नी अपने पति को तिलक लगाकर विदा करती है, लेकिन एक ‘विधवा’ के रूप में।
  • प्रतीकात्मक त्याग: पत्नी अपनी माँग का सिन्दूर मिटा देती है, सफेद साड़ी पहनती है और हाथों से सुहाग का प्रतीक लोहे का कड़ा उतारकर पति को सौंप देती है।
  • मान्यता: जंगल में शिकारी और हिंसक जानवर के बीच संघर्ष में परिणाम कुछ भी हो सकता है। जब तक पति सुरक्षित लौट नहीं आता, पत्नी विधवा की तरह तपस्या और विलाप की मुद्रा में रहती है। पति के सुरक्षित लौटने पर ही वह पुनः सुहागन का श्रृंगार करती है।

दलमा राजा की अगुवाई में ‘सुरक्षा कवच’ पूजा

सेंदरा के औपचारिक आगाज से पहले एनएच-33 स्थित फोदोगोड़ा गांव के समीप दलमा पहाड़ की तलहटी में विशेष अनुष्ठान किया गया। दलमा राजा (राकेश हेंब्रम) ने खुद इस पूजा की कमान संभाली।

करीब आधा किलोमीटर की दुर्गम चढ़ाई के बाद प्राचीन पूजा स्थल पर ‘वन देवी’ की आराधना की गई। दलमा राजा का मानना है कि यह पूजा शिकारियों के लिए एक ‘सुरक्षा कवच’ की तरह काम करती है, जिससे जंगल में कोई अनहोनी नहीं होती।

“यह हमारी सदियों पुरानी परंपरा है। हम वन देवी की अनुमति लेकर ही जंगल में कदम रखते हैं। यह पर्व हमें अनुशासन और सामूहिकता सिखाता है।”राकेश हेंब्रम (दलमा राजा)


अनुशासन और सामूहिकता: 12-12 की टोली में कूच

सेंदरा में सुरक्षा ही सबसे बड़ा मंत्र है। शिकारी कभी अकेले नहीं जाते, बल्कि 12-12 की टोलियों में निकलते हैं:

  1. पारंपरिक हथियार: तीर-धनुष, भाला और दाउली से लैस होकर युवा और बुजुर्ग पहाड़ों की ओर कूच करते हैं।
  2. सहयोग: घने जंगलों में हिंसक जानवरों के हमले के समय यह समूह एक-दूसरे की ढाल बनता है।
  3. ज्ञान का आदान-प्रदान: बड़े-बुजुर्ग युवाओं को जंगल के रास्तों और दुर्लभ जड़ी-बूटियों की पहचान सिखाते हैं।

शिकार नहीं, विरासत को सहेजने का मकसद

आज के आधुनिक युग में सेंदरा का स्वरूप बदला है। अब यह शिकार से ज्यादा एक प्रतीकात्मक पर्व बन गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य वन्यजीव संरक्षण और परंपरा के बीच संतुलन बनाना है। आदिवासी समाज इस पर्व के जरिए अपनी आने वाली पीढ़ी को जंगल की भौगोलिक स्थिति, वनस्पति और अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करता है।

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निष्कर्ष: सेंदरा हमें याद दिलाता है कि आदिवासी समाज और जंगल का रिश्ता आज भी उतना ही अटूट है जितना सदियों पहले था। यह पर्व बलिदान, प्रेम और प्रकृति के प्रति समर्पण की एक अमर गाथा है।

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