छत्रपति संभाजीनगर में AIMIM के पूर्व पार्षद मतीन पटेल और स्थानीय निवासी हनीफ खान की संपत्तियों को ढहाने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने नगर निगम की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताई है। सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ कहा कि “महाराष्ट्र में यूपी या बिहार जैसी बुलडोजर संस्कृति को जगह नहीं दी जा सकती।”
क्या है पूरा मामला?
नगर निगम ने 13 मई को मतीन पटेल और हनीफ खान से जुड़ी संपत्तियों पर कथित अवैध निर्माण का हवाला देते हुए बुलडोजर कार्रवाई की थी। इसके बाद दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट का रुख किया और कार्रवाई को चुनौती दी।
हाईकोर्ट की कड़ी फटकार
जस्टिस सिद्धेश्वर थोम्ब्रे की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी का घर तोड़ना एक गंभीर कदम है और इसे मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि लोग अपनी पूरी जिंदगी की कमाई से घर बनाते हैं, इसलिए बिना उचित प्रक्रिया के उसे गिराना गलत है। कोर्ट ने प्रशासन की कार्रवाई को “मनमाना” बताते हुए सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करार दिया। अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी अतिक्रमण या अवैध निर्माण को तोड़ने से पहले कम से कम 15 दिनों का नोटिस देना अनिवार्य है, ताकि प्रभावित व्यक्ति अपना पक्ष रख सके या कानूनी राहत ले सके।
नियमों की अनदेखी पर सवाल
हाईकोर्ट ने पाया कि नगर निगम ने तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया और बिना पर्याप्त समय दिए ही कार्रवाई कर दी, जिसे अदालत ने गंभीर प्रशासनिक चूक माना। इसी आधार पर कोर्ट ने बुलडोजर कार्रवाई पर सवाल उठाए।
पृष्ठभूमि में आरोप
नगर निगम का कहना था कि मतीन पटेल पर नासिक TCS मामले की आरोपी निदा खान को शरण देने का आरोप है, जिसके बाद यह कार्रवाई की गई। पुलिस ने निदा खान को 7 मई को छत्रपति संभाजीनगर से गिरफ्तार किया था।
राजनीतिक और कानूनी बहस तेज
इस फैसले के बाद एक बार फिर देश में “बुलडोजर कार्रवाई” और कानूनी प्रक्रिया को लेकर बहस तेज हो गई है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि कानून के दायरे से बाहर जाकर किसी भी तरह की त्वरित दंडात्मक कार्रवाई स्वीकार नहीं की जा सकती।
