गढ़वा जिला मुख्यालय और आसपास के क्षेत्रों में दम तोड़ती सरस्वती नदी के पुनर्जीवन के लिए जनभागीदारी से शुरू किया गया ऐतिहासिक ‘आपन सरवस्तिया’ अभियान इन दिनों दम तोड़ता नजर आ रहा है। तत्कालीन सदर अनुमंडल पदाधिकारी (SDM) संजय कुमार की अनूठी पहल और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के दम पर शुरू हुआ यह जन-आंदोलन उनके स्थानांतरण (तबादले) के बाद पूरी तरह सुस्त पड़ गया है। अभियान की रफ्तार थमने से स्थानीय पर्यावरण प्रेमियों और जागरूक नागरिकों में गहरी निराशा और चिंता व्याप्त है।
बिना किसी सरकारी बजट और टेंडर के बनी थी देश के लिए मिसाल
इस अभियान की सबसे खास और अनूठी बात यह थी कि 25 मई (2026) को शुरू हुई इस मुहिम के लिए न तो सरकार से किसी विशेष फंड या बजट का सहारा लिया गया और न ही किसी ठेकेदार (संवेदक) या टेंडर की जरूरत पड़ी।
- जनसहभागिता: पूरी तरह से जनता के आर्थिक सहयोग, स्वैच्छिक श्रमदान और तत्कालीन एसडीएम के बेहतरीन समन्वय से यह कार्य चल रहा था।
- अतिक्रमण पर कार्रवाई: अभियान के तहत भारी संख्या में लोग खुद कुदाल-फावड़ा लेकर नदी की सफाई में जुटे थे। वहीं, प्रशासन ने जेसीबी (JCB) मशीनों की मदद से नदी के बहाव क्षेत्र को संकुचित करने वाले बड़े-बड़े अवैध अतिक्रमणों को भी ध्वस्त कर दिया था।
गढ़वा की जीवनदायिनी है सरस्वती नदी
भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो मेराल प्रखंड के ‘किनू आहार’ से निकलने वाली यह पौराणिक सरस्वती नदी गढ़वा शहर के बीचों-बीच से होकर गुजरती है और आगे चलकर सोनपुरवा के पास दानरो नदी में मिल जाती है। दशकों से सरकारी उपेक्षा, कचरे के अंबार और भू-माफियाओं के अतिक्रमण का शिकार रही इस नदी को फिर से सदानीरा और जीवंत बनाने के लिए गढ़वा के हजारों लोग स्वतः स्फूर्त होकर इस अभियान का हिस्सा बने थे।

अधिकारी बदलते ही घाटों पर पसरा सन्नाटा, उठने लगे सवाल
संजय कुमार के गढ़वा से विदा होते ही अभियान की जमीनी गतिविधियां पूरी तरह ठप हो गई हैं। जिन नदी घाटों पर सुबह और शाम सैकड़ों युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओं की टोली श्रमदान और सफाई के लिए जुटती थी, वहां अब दोबारा सन्नाटा पसर गया है।
इस स्थिति ने प्रशासनिक व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
बड़ा सवाल: क्या जनहित और पर्यावरण से जुड़े किसी बड़े अभियान की सफलता या निरंतरता केवल एक अकेले अधिकारी की मौजूदगी पर निर्भर रहनी चाहिए? क्या अधिकारी के जाते ही पूरी व्यवस्था को उस मुहिम से पल्ला झाड़ लेना चाहिए?
अब नए प्रशासन और गढ़वा की जनता की ‘अग्निपरीक्षा’
स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों का साफ कहना है कि ‘आपन सरवस्तिया’ सिर्फ एक नदी सफाई अभियान नहीं था, बल्कि यह गढ़वा की पहचान, पर्यावरण और सामूहिक स्वाभिमान का प्रतीक बन चुका था। अब यह वर्तमान जिला प्रशासन और गढ़वा के जागरूक नागरिकों के लिए एक अग्निपरीक्षा की घड़ी है। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि यह मुहिम एक मुकम्मल जन-आंदोलन बनकर इतिहास रचेगी या फिर एक शानदार और सफल शुरुआत के बाद विभागीय फाइलों और राजनीति की भेंट चढ़कर अधूरी रह जाएगी।
