झारखंड की सरकारी स्वास्थ्य और आपातकालीन एंबुलेंस सेवा इस वक्त बेहद गंभीर संकट से गुजर रही है। महालेखाकार (AG) कार्यालय द्वारा उठाए गए 16 गंभीर एतराजों और आपत्तियों के बाद राज्य में एंबुलेंसों की मरम्मत, नई एंबुलेंसों की खरीद और करोड़ों रुपये के अत्याधुनिक चिकित्सा उपकरणों की टेंडर प्रक्रिया पर पूरी तरह ब्रेक लग गया है। इससे पूरे राज्य की लचर स्वास्थ्य व्यवस्था और चरमराने की आशंका पैदा हो गई है।
महालेखाकार कार्यालय ने ‘झारखंड मेडिकल एंड हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट एंड प्रोक्योरमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ (JMHIDPCL) को ऑडिट रिपोर्ट भेजकर 16 मुख्य बिंदुओं पर तत्काल स्पष्टीकरण मांगा है। एजी की टीम ने 9 से 23 मार्च 2026 के बीच स्वास्थ्य निगम के रिकॉर्ड्स की सघन जांच की थी, जिसके बाद 1 जून 2026 को आधिकारिक ऑडिट निरीक्षण प्रतिवेदन जारी कर निगम को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का अल्टीमेटम दिया था।
पूर्वी सिंहभूम (जमशेदपुर) में बदहाल स्थिति, 62% एंबुलेंस कबाड़ में तब्दील
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, औद्योगिक नगरी जमशेदपुर और पूरे पूर्वी सिंहभूम जिले में स्थिति सबसे अधिक डरावनी और चिंताजनक है। जिले के बेड़े में कुल 34 सरकारी एंबुलेंस आवंटित हैं, जिनमें से 21 एंबुलेंस पूरी तरह खराब और कबाड़ होकर खड़ी हैं। इनमें से 11 एंबुलेंस तो खासमहल स्थित सदर अस्पताल परिसर में ही धूल फांक रही हैं।
इसका सीधा मतलब यह है कि जिले की 62 प्रतिशत से अधिक सरकारी एंबुलेंस सड़कों पर चलने की स्थिति में ही नहीं हैं। वर्तमान में महज 13 एंबुलेंस के भरोसे पूरे जिले की आपातकालीन और जीवन रक्षक स्वास्थ्य सेवा घिसट रही है। नतीजतन, सड़क दुर्घटनाओं के घायलों, गंभीर मरीजों और गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुंचाना दूभर हो गया है। इस लाचारी का फायदा उठाकर निजी एंबुलेंस संचालक मरीजों से 50 से 60 रुपये प्रति किलोमीटर तक का मनमाना किराया वसूल रहे हैं।
एमजीएम समेत 8 मेडिकल कॉलेजों में एमआरआई और सीटी स्कैन मशीनों की खरीद अटकी
एजी (AG) की इन तकनीकी व वित्तीय आपत्तियों की सीधी गाज राज्य की स्वास्थ्य अधिसंरचना पर भी पड़ी है। जमशेदपुर के एमजीएम (MGM) अस्पताल और सदर अस्पताल में बहुप्रतीक्षित एमआरआई (MRI) और सीटी स्कैन (CT Scan) मशीनों की खरीद प्रक्रिया अधर में लटक गई है। केवल जमशेदपुर ही नहीं, बल्कि झारखंड के सभी आठ (8) सरकारी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पतालों में लगने वाली करोड़ो रुपये की एमआरआई मशीनों का टेंडर रुक गया है। इन बड़े अस्पतालों में प्रतिदिन औसतन 12 से 15 गंभीर गरीब मरीज इन जांचों के लिए आते हैं, जिन्हें अब निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों में मोटी रकम खर्च करनी पड़ रही है।
एजी ने इन प्रमुख बिंदुओं पर मांगा है कड़ा जवाब
महालेखाकार कार्यालय ने मुख्य रूप से निम्नलिखित संदिग्ध और ढुलमुल प्रक्रियाओं पर स्पष्टीकरण मांगा है:
- एंबुलेंस की खरीद, वितरण और उनकी समय पर मरम्मत न होने का कारण।
- एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी जीवन रक्षक मशीनों की खरीद में हो रही देरी।
- चिकित्सा उपकरणों की खरीद प्रक्रिया, टेंडर आवंटन और भुगतान व्यवस्था में गड़बड़ी।
- उपकरणों की गुणवत्ता जांच (Quality Check), निरीक्षण स्वीकृति (Inspection Approval) और इसमें खरीद एजेंसियों की संदिग्ध भूमिका।

स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने दिया पारदर्शी समाधान का आश्वासन
इस पूरे प्रशासनिक और राजकोषीय गतिरोध पर राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने सरकार का पक्ष रखते हुए स्थिति को जल्द संभालने का दावा किया है। उन्होंने कहा:
“महालेखाकार (एजी) द्वारा उठाए गए सभी 16 बिंदुओं और मुद्दों की विभाग के उच्च अधिकारियों के साथ गंभीरता से समीक्षा की जा रही है। सरकार पूरी पारदर्शिता के साथ समय सीमा के भीतर एजी के सभी सवालों का बिंदुवार जवाब देगी। हमारी सरकार के लिए मरीजों की सुविधा और स्वास्थ्य सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। जिन जिलों में एंबुलेंस खराब हैं, वहां तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही ठप पड़ी एमआरआई और सीटी स्कैन मशीनों की खरीद प्रक्रिया को भी जल्द सुचारू किया जाएगा।”
