एग्जाम का प्रेशर या हार्ट ब्रेक: क्यों बढ़ जाती है जंक फूड की तलब? समझें इसके पीछे का साइंटिफिक कारण

व्यक्ति पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि अपने तनाव, उदासी, एंग्जायटी या बोरियत जैसी भावनाओं को दबाने के लिए खा रहा है।

Johar News Times
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आपने अक्सर देखा होगा कि जब लोग परीक्षा के तनाव में होते हैं, ऑफिस के काम से परेशान होते हैं या किसी वजह से अकेलापन महसूस करते हैं, तो उनका हाथ सीधे फ्रिज या स्नैक्स के डिब्बे की तरफ बढ़ता है। मेडिकल की भाषा में इसे ‘इमोशनल ईटिंग’ (Emotional Eating) कहा जाता है।

इसका सीधा सा मतलब है कि व्यक्ति पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि अपने तनाव, उदासी, एंग्जायटी या बोरियत जैसी भावनाओं को दबाने के लिए खा रहा है। इसके पीछे का असली साइंस क्या है और खाना किस तरह हमारी भावनाओं को प्रभावित करता है।

1. कोर्टिसोल हार्मोन का खेल

जब भी हम किसी तनावपूर्ण स्थिति से गुजरते हैं, तो हमारा शरीर ‘फाइट या फ्लाइट’ मोड में आ जाता है। इस दौरान शरीर में कोर्टिसोल (Cortisol) नाम का स्ट्रेस हार्मोन तेजी से रिलीज होने लगता है।

दिमाग को मिलता है गलत सिग्नल: कोर्टिसोल का मुख्य काम शरीर को एनर्जी देना है। लेकिन जब तनाव लंबे समय तक खिंचता है, तो यह हार्मोन दिमाग को यह गलत संकेत देता है कि शरीर को तुरंत भारी मात्रा में ताकत की जरूरत है। यही वजह है कि स्ट्रेस के दौरान लोगों को मीठा, नमकीन और हाई-फैट वाले फूड्स (जैसे- पेस्ट्री, चिप्स, चॉकलेट या पिज्जा) खाने की तीव्र क्रेविंग (तलब) होती है।

2. कंफर्ट फूड और डोपामाइन का कनेक्शन

इन अनहेल्दी फूड्स को हम ‘कंफर्ट फूड’ भी कहते हैं, क्योंकि इन्हें खाते ही हमारे दिमाग में डोपामाइन (Dopamine) नाम का ‘फील-गुड’ केमिकल रिलीज होता है। डोपामाइन हमें तुरंत कुछ समय के लिए खुशी और सुकून का अहसास कराता है।

शॉर्ट-टर्म रिलीफ का नुकसान: हालांकि, यह राहत बेहद कम समय के लिए होती है। जैसे ही खाना पचता है, तनाव का स्तर वापस वहीं पहुंच जाता है। इसके बाद व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा अनहेल्दी खाने के लिए पछतावा (Guilt) होने लगता है।

3. हंगर हार्मोन्स में गड़बड़ी और बचपन की आदतें

हमारा दिमाग अक्सर खाने को भावनात्मक सुरक्षा (Emotional Security) से जोड़ लेता है। उदाहरण के लिए, अगर बचपन में किसी बच्चे को रोने या उदास होने पर चॉकलेट-मीठा देकर चुप कराया गया हो, तो उसका दिमाग वयस्क होने पर भी तनाव से निपटने के लिए इसी पैटर्न को दोहराता है।

इसके अलावा, लगातार रहने वाला स्ट्रेस हमारी भूख को कंट्रोल करने वाले दो मुख्य हार्मोन्स— घ्रेलिन (Ghrelin) और लेप्टिन (Leptin) के संतुलन को बिगाड़ देता है। इस वजह से व्यक्ति असली भूख और भावनात्मक भूख के बीच का अंतर नहीं समझ पाता।

कैसे सुधारें इमोशनल ईटिंग की यह आदत?

यदि आप भी स्ट्रेस में ज्यादा खाने लगते हैं, तो इन 4 स्टेप्स से इस आदत को बदल सकते हैं:

  • ट्रिगर्स को पहचानें: जब भी बिना समय के कुछ खाने का मन करे, तो खुद से रुककर पूछें— क्या सच में पेट खाली है या आप सिर्फ किसी बात से परेशान हैं?
  • माइंडफुल ईटिंग अपनाएं: खाना खाते समय टीवी, लैपटॉप या मोबाइल पूरी तरह बंद रखें। खाने के हर निवाले का स्वाद लें और चबा-चबाकर धीरे खाएं।
  • स्ट्रेस मैनेजमेंट के विकल्प ढूंढें: तनाव महसूस होने पर फ्रिज की तरफ भागने के बजाय 10 मिनट के लिए मेडिटेशन करें, डायरी लिखें (जर्नलिंग) या किसी दोस्त से बात करें।
  • पूरी नींद और एक्सरसाइज: रोजाना 7-8 घंटे की अच्छी नींद और नियमित वर्कआउट से शरीर में कोर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) का लेवल प्राकृतिक रूप से कम रहता है।

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