रेमिंग मास प्लांट बना ‘मौत का कारखाना’, 26 वर्षों में 1036 मजदूरों की मौत; सिर्फ 37 परिवारों को मिला मुआवजा

रेमिंग मास प्लांट बना ‘मौत का कारखाना’, 26 वर्षों में 1036 मजदूरों की मौत; सिर्फ 37 परिवारों को मिला मुआवजा

Johar News Times
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जमशेदपुर, पूर्वी सिंहभूम जिले के मुसाबनी, पोटका और धालभूमगढ़ क्षेत्र में क्वार्ट्ज (सफेद) पत्थर की पिसाई करने वाले रेमिंग मास प्लांट मजदूरों के लिए मौत का कारण बनते जा रहे हैं। बीते 26 वर्षों में सिलिकोसिस जैसी जानलेवा बीमारी से 1036 मजदूरों की मौत हो चुकी है। यह चौंकाने वाला आंकड़ा मजदूरों और मृतकों के परिजनों को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ रही संस्था ओसाज इंडिया के महासचिव समित कर ने साझा किया है।

स्थिति इतनी भयावह है कि आज भी इन प्लांटों में काम करने वाले मजदूर लगातार सिलिकोसिस की चपेट में आ रहे हैं। मजदूरों का आरोप है कि वर्षों तक धूल भरे वातावरण में काम कराने के बावजूद न तो सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम किए गए और न ही समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराई गई। इसका परिणाम यह हुआ कि सैकड़ों परिवार उजड़ गए और हजारों लोगों की जिंदगी संकट में पड़ गई।

ओसाज इंडिया की लंबी कानूनी और सामाजिक लड़ाई के बाद अब तक सिर्फ 37 मृतक मजदूरों के आश्रितों को मुआवजा मिल पाया है। इनमें मुसाबनी के 34, धालभूमगढ़ के 2 और डुमरिया के 1 मृतक मजदूर का परिवार शामिल है। प्रत्येक परिवार को 4 लाख रुपये की दर से कुल 1.50 करोड़ रुपये मुआवजा दिया गया है।

मानवाधिकार आयोग के निर्देश के बाद वर्ष 2015 में झारखंड सरकार ने सिलिकोसिस से मृत मजदूरों के लिए मुआवजा तय किया था। इसके बाद वर्ष 2021 में आयोग के हस्तक्षेप पर जीवित सिलिकोसिस पीड़ित मजदूरों को 1 लाख रुपये सहायता राशि देने का प्रावधान किया गया। वहीं पीड़ित की मौत के बाद उसके परिजनों को 4 लाख रुपये दिए जाते हैं।

कैसी होती है सिलिकोसिस बीमारी

सिलिकोसिस एक लाइलाज और बेहद खतरनाक बीमारी मानी जाती है। सफेद पत्थर यानी क्रोनाइट पत्थर की पिसाई के दौरान उड़ने वाले महीन धूलकण मजदूरों के फेफड़ों में जमा हो जाते हैं। धीरे-धीरे फेफड़े संक्रमित हो जाते हैं और शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। बीमारी बढ़ने के साथ शरीर कमजोर होता जाता है और अंततः पीड़ित की मौत हो जाती है।

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर 26 वर्षों में 1036 मौतों के बावजूद जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हुई और कब तक मजदूरों की जिंदगी यूं ही धूल में दफन होती रहेगी।

‘4 लाख नहीं, 20 लाख मुआवजा मिले’

ओसाज इंडिया के महासचिव समित कर ने कहा कि इतनी भयावह स्थिति को देखते हुए 4 लाख रुपये मुआवजा बेहद कम है। उन्होंने मानवाधिकार आयोग के माध्यम से राज्य सरकार से मृतक मजदूरों के परिजनों को 20 लाख रुपये मुआवजा देने की मांग की है। उनका कहना है कि परिवार के कमाने वाले सदस्य की मौत के बाद कई घरों में भुखमरी और आर्थिक संकट की स्थिति पैदा हो गई है।

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