देश के वस्त्र और परिधान उद्योग ने सरकार से कपास (कॉटन) पर लगने वाले 11 प्रतिशत आयात शुल्क को समाप्त करने की मांग की है। उद्योग जगत का कहना है कि कच्चे माल की बढ़ती कीमतों से टेक्सटाइल सेक्टर की लागत लगातार बढ़ रही है, जिससे वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो रही है।
परिधान उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल, कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह से मुलाकात कर आयात शुल्क को 11 प्रतिशत से घटाकर शून्य करने की मांग रखी।
उद्योग प्रतिनिधियों ने कहा कि भारत ने हाल के वर्षों में कई मुक्त व्यापार समझौते (FTA) किए हैं, जिससे टेक्सटाइल और गारमेंट निर्यात के लिए बड़े अवसर पैदा हुए हैं। लेकिन अन्य प्रतिस्पर्धी देशों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सस्ती दरों पर कपास उपलब्ध हो रही है, जबकि भारतीय उद्योगों को महंगे कच्चे माल का सामना करना पड़ रहा है।
प्रतिनिधियों ने कहा कि आयात शुल्क कम होने से भारतीय वस्त्र उद्योग को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलेगी। इससे निर्यात बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने और रोजगार सृजन में मदद मिल सकती है।
उद्योग जगत के अनुसार चालू वर्ष में टेक्सटाइल सेक्टर को लगभग 337 लाख गांठ कपास की आवश्यकता होगी, जबकि 2025-26 सीजन में कपास की उपलब्धता करीब 292.15 लाख गांठ रहने का अनुमान है। यानी मांग और आपूर्ति के बीच लगभग 45 लाख गांठ का अंतर रह सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते आयात शुल्क में राहत नहीं दी गई, तो स्पिनिंग मिलों और डाउनस्ट्रीम टेक्सटाइल उद्योगों पर लागत का दबाव और बढ़ सकता है। इससे उत्पादन लागत बढ़ने के साथ निर्यात पर भी असर पड़ने की आशंका है।
