कोरोना काल के बाद वर्क फ्रॉम होम का चलन काफी बढ़ा है, जिसने हमें फ्लेक्सिबिलिटी तो दी लेकिन साथ ही ‘बर्नआउट’ जैसी एक गंभीर समस्या को भी जन्म दे दिया है। अक्सर न्यू मॉम्स या घर से काम करने वाले पेशेवर इस उम्मीद में इसे चुनते हैं कि वे अपनी व्यक्तिगत और व्यावसायिक जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से संतुलित कर पाएंगे, लेकिन धीरे-धीरे काम का तनाव उनकी सहनशक्ति से बाहर होने लगता है। अगर आप भी दिन भर काम करने के बाद बेवजह चिड़चिड़ापन महसूस कर रहे हैं, तो यह महज शारीरिक थकान नहीं बल्कि मानसिक बर्नआउट का एक बड़ा संकेत हो सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि बर्नआउट को समय रहते पहचानना अनिवार्य है, क्योंकि इसे नजरअंदाज करना भविष्य में गंभीर मानसिक बीमारियों का कारण बन सकता है। इसके प्रमुख लक्षणों में नींद पूरी होने के बावजूद सुबह उठते ही भारी थकान महसूस होना, काम में एकाग्रता की कमी और छोटे-छोटे टास्क को पूरा करने में जरूरत से ज्यादा समय लगना शामिल है। जब व्यक्ति बर्नआउट का शिकार होता है, तो वह छोटी-छोटी बातों पर परिवार या सहकर्मियों पर गुस्सा करने लगता है और धीरे-धीरे अपनी उपलब्धियों में खुशी महसूस करना बंद कर देता है। इसके अलावा, रात भर काम के बारे में सोचना, बिना किसी बीमारी के सिरदर्द या पीठ दर्द जैसी शारीरिक समस्याएं और अपनों से दूरी बना लेना इसके स्पष्ट संकेत हैं। डिजिटल एडिक्शन भी इसका एक हिस्सा है, जहां काम खत्म होने के बाद भी व्यक्ति बार-बार ईमेल और मैसेज चेक करता रहता है।
इस स्थिति से उबरने के लिए सबसे जरूरी कदम है अपने काम और निजी जीवन के बीच स्पष्ट सीमाएं निर्धारित करना। लैपटॉप बंद करने का एक निश्चित समय तय करें और बिस्तर या सोफे के बजाय एक अलग डेस्क का उपयोग करें ताकि दिमाग वर्क मोड और रिलैक्स मोड के बीच अंतर समझ सके। काम के दौरान हर एक घंटे में स्क्रीन से दूर होकर छोटा ब्रेक लेना और ऑफिस के घंटों के बाद डिजिटल डिटॉक्स अपनाना आपकी मानसिक सेहत के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है। अपनी हॉबी और परिवार को समय देकर ही आप इस मानसिक थकान के चक्र को तोड़ सकते हैं।








