झारखंड कांग्रेस में नई प्रदेश कांग्रेस कमेटी के गठन के साथ ही अंतर्कलह की आग भड़क उठी है। पार्टी के भीतर असंतोष अब सार्वजनिक मंचों पर आ गया है। राज्य के वित्त मंत्री और कद्दावर नेता राधाकृष्ण किशोर ने प्रदेश नेतृत्व की कार्यशैली पर तीखे सवाल खड़े करते हुए मोर्चा खोल दिया है। इस विवाद ने तब और तूल पकड़ लिया जब उनके पुत्र प्रशांत किशोर ने नवनियुक्त प्रदेश सचिव के पद से इस्तीफा दे दिया।
‘एक आंख में काजल, एक आंख में सुरमा’
राधाकृष्ण किशोर ने सोशल मीडिया के जरिए अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। के. राजू को संबोधित एक पत्र साझा करते हुए उन्होंने पार्टी के फैसलों पर “दोहरी नीति” अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने पूर्व मंत्री योगेंद्र साव पर हुई अनुशासनात्मक कार्रवाई और रमा खलखो को पद दिए जाने की तुलना करते हुए इसे “एक आंख में काजल, एक आंख में सुरमा” करार दिया।
जंबो कमेटी पर उठाए सवाल
314 सदस्यों वाली इस भारी-भरकम कमेटी की उपयोगिता पर सवाल उठाते हुए किशोर ने कहा:
- पार्टी को पांच राज्यों के चुनावी नतीजों से सबक लेना चाहिए।
- सिर्फ पद बांटने से संगठन मजबूत नहीं होता, ठोस निर्णयों की जरूरत है।
- भीड़ जुटाने के बजाय निष्ठावान कार्यकर्ताओं को सही जगह मिलनी चाहिए।
संगठन के भीतर प्रतिक्रिया
इस सियासी घमासान पर पार्टी के भीतर से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं:
- उन्होंने पुष्टि की कि राधाकृष्ण किशोर का पत्र प्रदेश प्रभारी तक भेज दिया गया है। अनुशासन समिति मामले पर नजर रखे हुए है।मुंजनी ने कहा कि लोकतंत्र में सबकी अपनी महत्वाकांक्षा होती है, लेकिन अपनी बात सार्वजनिक करने के बजाय पार्टी के फोरम पर रखनी चाहिए थी। उन्होंने प्रशांत किशोर के इस्तीफे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि पार्टी ने हर वर्ग को प्रतिनिधित्व दिया है, जिसे जिम्मेदारी मिली थी उन्हें काम करना चाहिए था।
अनुशासन का डंडा या समझौता?
फिलहाल गेंद प्रदेश प्रभारी और केंद्रीय नेतृत्व के पाले में है। जहां एक ओर अनुशासनहीनता की बातें कही जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर दिग्गज नेताओं की नाराजगी आगामी चुनावों में पार्टी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकती है। क्या नेतृत्व राधाकृष्ण किशोर को मनाने में सफल होगा या कार्रवाई की गाज गिरेगी, यह आने वाला वक्त बताएगा।










