जमशेदपुर: औद्योगिक नगरी जमशेदपुर में शोषण और संघर्ष की एक ऐसी दास्तां सामने आई है, जो आधुनिक भारत के श्रमिक अधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। टाटा मोटर्स के उत्पादित भारी वाहनों और चेचिस को देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचाने वाले कंवाई चालकों (Convoy Drivers) का धरना आज 25वें महीने में प्रवेश कर चुका है। 1 मार्च 2024 से शुरू हुआ यह आंदोलन कड़ाके की ठंड, चिलचिलाती धूप और मूसलाधार बारिश के बावजूद एक दिन के लिए भी नहीं रुका।

आंदोलन के 25 महीने: क्या बदला और क्या नहीं?
चालकों का आरोप है कि इस सवा दो साल के लंबे अंतराल में व्यवस्था के कई चेहरे बदल गए, लेकिन उनकी किस्मत नहीं बदली:
- बदलते अधिकारी: इस दौरान टाटा मोटर्स के तीन प्लांट हेड बदल चुके हैं। जिले के कई उपायुक्त (DC), एसडीओ (SDO) और डीएलसी (DLC) आए और गए।
- बदलती सरकार: राज्य की सत्ता और सियासत में भी बदलाव हुए, लेकिन किसी ने भी इन मज़दूरों की सुध नहीं ली।
- सुविधाओं का अभाव: जहाँ एक ओर टाटा मोटर्स के स्थाई मज़दूरों की मज़दूरी और सुविधाओं में समय-समय पर बढ़ोतरी की गई, वहीं कंवाई चालकों को हाशिए पर छोड़ दिया गया।
₹370 में 24 घंटे की ड्यूटी: आधुनिक युग में ‘बंधुआ’ मज़दूरी?
चालक संगठन ने मज़दूरी की दर को लेकर गहरा रोष प्रकट किया है। उनका कहना है कि आज के दौर में जब महंगाई आसमान छू रही है, टाटा मोटर्स जैसी प्रतिष्ठित कंपनी के वाहनों को चलाने वाले चालकों को 24 घंटे के लिए मात्र ₹370 दिए जा रहे हैं। संगठन का दावा है कि विश्व में कहीं भी भारी वाहन चालकों की मज़दूरी इतनी कम नहीं है।
सत्ता और विपक्ष की ‘चुप्पी’ पर सवाल
चालक संगठन ने इस मामले में स्थानीय जनप्रतिनिधियों और राज्य सरकार को भी आड़े हाथों लिया है:
- मुख्यमंत्री पर कटाक्ष: चालकों का कहना है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को असम के चाय बागान मज़दूरों का शोषण तो दिख रहा है, लेकिन उनके अपने राज्य के औद्योगिक केंद्र जमशेदपुर में मज़दूर सड़कों पर हैं।
- विधायक सरयू राय पर निशाना: भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर रहने वाले माननीय विधायक सरयू राय की इस मुद्दे पर चुप्पी को लेकर भी चालकों ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि “भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले नेता भी इस मामले में बगलें झांक रहे हैं।”
“सच्चाई से समझौता नहीं करेंगे चालक”
कंवाई चालकों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपना कर्तव्य निभा रहे हैं और अपना विरोध तब तक जारी रखेंगे जब तक उन्हें न्याय नहीं मिल जाता। संगठन ने चेतावनी दी है कि वे शोषण की इस सच्चाई को उजागर करने में किसी भी रसूखदार व्यक्ति या संस्थान को नहीं छोड़ेंगे।
बड़ा सवाल: क्या टाटा मोटर्स जैसी विश्वस्तरीय कंपनी और झारखंड का प्रशासनिक तंत्र इन मज़दूरों की जायज़ मांगों को सुनने के लिए किसी बड़ी अनहोनी का इंतज़ार कर रहा है? या फिर ₹370 की यह ‘दिहाड़ी’ विकास के दावों के पीछे की कड़वी हकीकत बनी रहेगी?










