रांची। राज्य में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर सरकार और राजभवन (लोक भवन) के बीच खींचतान और गहरी हो गई है। गवर्नर संतोष कुमार गंगवार ने दूसरी बार नियुक्ति से जुड़ी फाइल राज्य सरकार को लौटा दी है। इस बार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया गया है कि चयन प्रक्रिया नियमों और पारदर्शिता के मानकों के अनुरूप होनी चाहिए।
राजभवन ने विशेष रूप से उन नामों पर आपत्ति जताई है, जिनके खिलाफ एफआईआर दर्ज है। साथ ही यह भी कहा गया है कि राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़े व्यक्तियों की नियुक्ति सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 15(6) के तहत उचित नहीं है।
राज्य सरकार द्वारा भेजे गए पैनल में अनुज सिन्हा, तनुज खत्री, अमूल्य नीरज खलखो और शिवपूजन पाठक के नाम शामिल थे। इनमें से दो नामों पर पहले भी आपत्ति जताई गई थी, क्योंकि उनके खिलाफ पुलिस में मामले दर्ज हैं और वे न्यायालय में लंबित हैं। इसके बावजूद सरकार ने वही पैनल दोबारा भेजते हुए सभी को योग्य और समाजसेवी बताया।
राजभवन ने इस बात पर भी नाराजगी जताई है कि मुख्य सूचना आयुक्त के पद के लिए कोई नाम प्रस्तावित नहीं किया गया, जबकि बिना इस पद के राज्य सूचना आयोग का गठन अधूरा माना जाता है।
इस पूरे विवाद की शुरुआत 25 मार्च को हुई चयन समिति की बैठक से हुई थी, जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने की थी। बैठक में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी और मंत्री हफीजुल हसन भी शामिल थे। बैठक में चार नामों पर सहमति बनी और फाइल राज्यपाल को भेजी गई, जिसे 10 अप्रैल को पहली बार वापस कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने अंजलि भारद्वाज बनाम भारत संघ मामले में स्पष्ट किया है कि सूचना आयोग में नियुक्तियां योग्यता, निष्पक्षता और विविध अनुभव के आधार पर होनी चाहिए। कोर्ट ने चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने, मानदंड सार्वजनिक करने और उम्मीदवारों की जानकारी साझा करने पर भी जोर दिया है।
अब आगे सरकार के पास विकल्प है कि वह नए नामों के साथ प्रस्ताव भेजे या विधिक राय के आधार पर पुराने नामों को फिर से भेजे। हालांकि, यदि वही पैनल दोबारा भेजा जाता है, तो फाइल को तीसरी बार लौटाना राजभवन के लिए भी आसान नहीं माना जा रहा है।










