खरसावां: रिडींग तालाब का सिंचाई नाला जर्जर, 1500 एकड़ खेती पर संकट; ग्रामीणों ने की डीसी से गुहार

"खरसावां में फूटा किसानों का दर्द: जर्जर सिंचाई नाले के कारण 1500 एकड़ में धान की खेती पर मंडराया सूखा संकट।"

Johar News Times
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खरसावां प्रखंड के रिडींग गांव स्थित सरकारी तालाब का मुख्य सिंचाई नाला पूरी तरह से टूट-फूट कर जर्जर हो चुका है। इस नाले की बदहाली ने क्षेत्र के हजारों किसानों की रातों की नींद उड़ा दी है। मानसून की दस्तक के साथ ही किसानों को यह चिंता सताने लगी है कि अगर समय रहते नाले को ठीक नहीं किया गया, तो इस साल धान की बुआई और खेती पूरी तरह प्रभावित हो जाएगी।

इन गांवों की लाइफलाइन है यह सिंचाई नाला

ग्रामीणों ने बताया कि हर साल बरसात के दौरान जब तालाब पानी से भर जाता है, तो इसी नाले के जरिए सिंचाई का पानी खेतों तक पहुंचता है। इस नाले पर किसी एक गांव की नहीं, बल्कि कई गांवों की खेती निर्भर है:

  • रिडींग और महतो रिडींग
  • कुम्हार रिडींग और बाबू रिडींग
  • खेजुरदा
  • बिरुजारा
  • चुरकाडीह

पिछले साल बांस-बल्ली के सहारे बची थी फसल, इस बार हालात बदतर

किसानों के अनुसार, वर्षों से इस नाले की मरम्मत नहीं कराई गई है। पिछले साल भी जब नाला टूटा था, तो किसानों ने अपनी जेब से पैसे खर्च कर बांस-बल्ली और बालू की बोरियों से अस्थायी मेड़बंदी की थी और जैसे-तैसे पानी खेतों तक पहुंचाया था। लेकिन इस बार नाला इतना अधिक क्षतिग्रस्त हो चुका है कि देसी जुगाड़ भी काम नहीं आएगा। क्षेत्र में सिंचाई का कोई दूसरा वैकल्पिक साधन भी उपलब्ध नहीं है।

“अगर समय रहते इस नाले का जीर्णोद्धार नहीं हुआ, तो सिर्फ धान ही नहीं, बल्कि आने वाले दिनों में साग-सब्जी और रबी फसलों का उत्पादन भी पूरी तरह ठप हो जाएगा। किसान भुखमरी की कगार पर आ जाएंगे।” — स्थानीय पीड़ित किसान

पंचायत प्रतिनिधियों ने फेरा मुंह, अब डीसी से उम्मीद

ग्रामीणों का आरोप है कि इस गंभीर समस्या को लेकर वे कई बार स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों के चक्कर काट चुके हैं, लेकिन आश्वासन के अलावा अब तक कोई ठोस पहल नहीं हुई। थक-हारकर प्रभावित गांवों के किसानों ने एक आवश्यक बैठक की और निर्णय लिया कि जल्द ही एक प्रतिनिधिमंडल सरायकेला-खरसावां के उपायुक्त से मिलकर उन्हें ज्ञापन सौंपेगा।

इस बैठक में विक्रम सिंहदेव, रमेश सिंहदेव, दीनानाथ सिंहदेव, मांगु कुम्हार, शंकर कुम्हार, सुजनी कुम्हार, संजय कुम्हार, चंद्रमोहन कुम्हार, मथुरा बेहरा, बल्लू बेहरा, विनाशंकर हेंब्रम, मनोहर हाईबुरु, नुरी हाईबुरु, गिनैत कुम्हार और परेश बेहरा समेत बड़ी संख्या में ग्रामीण और किसान मौजूद थे।

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