नई दिल्ली/मुंबई, देश के प्रमुख परोपकारी संस्थानों में शुमार टाटा ट्रस्ट ने अपनी नीतियों में बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव करने का निर्णय लिया है। चेयरमैन नोएल टाटा की अध्यक्षता में हुई बैठक में 100 साल से अधिक पुराने ट्रस्ट डीड में संशोधन के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है।
इस प्रस्ताव के तहत ट्रस्टी बनने के लिए पारसी समुदाय से होने की अनिवार्यता को समाप्त किया जाएगा। इस कदम को ट्रस्ट को अधिक समावेशी और आधुनिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
1923 के नियमों की विसंगति होगी दूर
ट्रस्ट के मुताबिक, ‘बाई हीराबाई जमशेदजी टाटा नवसारी चैरिटेबल इंस्टीट्यूशन’ के 1923 के नियमों में केवल पारसी समुदाय के लोगों को ही ट्रस्टी बनने की अनुमति थी। जबकि रतन टाटा द्वारा 1916 में बनाई गई मूल वसीयत में धर्म या जाति के आधार पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं था।
अब इस विसंगति को दूर करने के लिए महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के समक्ष कानूनी प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
विवाद के बाद तेज हुई प्रक्रिया
हाल के दिनों में पूर्व ट्रस्टी मेहली मिस्त्री ने गैर-पारसी सदस्यों की नियुक्ति पर सवाल उठाए थे। उन्होंने वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह की नियुक्ति पर आपत्ति जताई थी, जिसके बाद वेणु श्रीनिवासन ने ट्रस्ट से इस्तीफा दे दिया था।
हालांकि, ट्रस्ट ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2000 में एमएच कानिया की कानूनी राय के बाद से गैर-पारसी सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया जारी रही है।
गवर्नेंस मजबूत करने पर जोर
टाटा ट्रस्ट, जिसकी टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है, इस संशोधन के जरिए अपने गवर्नेंस ढांचे को और सशक्त करना चाहता है। बैठक में बोर्ड ने सीईओ सिद्धार्थ शर्मा के नेतृत्व पर भी भरोसा जताया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल आंतरिक विवादों को कम करेगा, बल्कि ट्रस्ट की वैश्विक साख और पारदर्शिता को भी नई मजबूती देगा।










