गुड़ाबांदा धान घोटाला: सचिव के ‘कुनबे’ ने डकारा किसानों का हक; ताला लगाकर सो गया प्रशासन, अब बिचौलियों के दर पर अन्नदाता!

गुड़ाबांदा/जमशेदपुर: नियम-कानून ताक पर, और ईमानदारी ठेंगे पर! बनमाकड़ी लैम्पस में हुए 2600 क्विंटल धान के ‘महाघोटाले’ ने साबित कर दिया है कि यहाँ सिस्टम ही भ्रष्टाचार का पोषक है। लैम्पस सचिव जवाहर लाल बारिक ने अपने बेटे, पत्नी और साले समेत पूरे परिवार के नाम पर 1064 क्विंटल की फर्जी खरीद दिखा दी, जबकि हकीकत में गोदाम खाली पड़ा है।
अधिकारियों की ‘फोटो वाली’ जिम्मेदारी: हैरानी की बात यह है कि एक सप्ताह पहले भारी हंगामे के बाद लैम्पस को सील तो कर दिया गया, लेकिन जांच की फाइलें धूल फांक रही हैं। अधिकारी केवल ज्ञापन लेने और फोटो खिंचवाने तक सीमित हैं। विधायक के सवाल-जवाब भी केवल कैमरे तक ही सीमित नजर आ रहे हैं, क्योंकि धरातल पर न तो सचिव पर एफआईआर हुई और न ही किसानों को कोई राहत मिली। आज भी इलाके का गरीब किसान अपनी फसल को औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर है।

जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो न्याय की उम्मीद किससे करें?
गुड़ाबांदा के बनमाकड़ी लैम्पस में धान खरीद के नाम पर जो ‘जादूगरी’ हुई है, उसने जिला प्रशासन की नींद उड़ा देनी चाहिए थी, लेकिन यहाँ तो प्रशासन ही गहरी नींद में है। सचिव ने फर्जी किसान आईडी बनाकर सरकारी खजाने में सेंध लगाई, लेकिन एक सप्ताह बाद भी जांच ‘प्रक्रिया’ के नाम पर अटकी है।
हकीकत का आईना:
- दावा: 3418 क्विंटल धान खरीद।
- मौके पर: सिर्फ 800 क्विंटल (करीब 2600 क्विंटल गायब)।
- जांच की स्थिति: शून्य।
सिर्फ लैम्पस सील कर देने से किसानों का पेट नहीं भरता। प्रमुख शुभोजित मुंडा और किसानों के प्रतिनिधिमंडल ने डीसी से मिलकर सीसीटीवी फुटेज खंगालने की मांग की है। सवाल यह है कि जब भ्रष्टाचार कैमरे और कागजों में कैद है, तो फिर कार्रवाई के लिए किस शुभ मुहूर्त का इंतज़ार किया जा रहा है? क्या यह सुस्ती किसी बड़े रसूखदार को बचाने की कोशिश है?











