झाड़ू-पोछा से विधानसभा तक: 2500 की सैलरी वाली कलिता माझी बनीं जनता की ‘प्रतिनिधि’

झाड़ू-पोछा से विधानसभा तक: 2500 की सैलरी वाली कलिता माझी बनीं जनता की ‘प्रतिनिधि’

Johar News Times
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में जहां भारतीय जनता पार्टी ने 206 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया, वहीं एक जीत ऐसी भी रही जिसने पूरे देश का ध्यान खींच लिया। घरों में झाड़ू-पोछा करने वाली 37 वर्षीय कलिता माझी ने अपनी मेहनत और जमीनी जुड़ाव के दम पर औसग्राम सीट से विधायक बनकर एक मिसाल कायम कर दी है।

कलिता माझी ने इस सीट पर तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार श्याम प्रसन्न लोहार को 12 हजार से अधिक वोटों से हराया। उन्हें कुल 1,07,692 वोट मिले। वहीं, लेफ्ट के चंचल कुमार माझी तीसरे और तापस बराल चौथे स्थान पर रहे। खास बात यह है कि 2021 के चुनाव में हार के बावजूद भाजपा ने उन पर भरोसा जताते हुए दोबारा टिकट दिया, जिसे उन्होंने इस बार जीत में बदल दिया।

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2500 रुपये महीना और बड़ा सपना

गुसकारा क्षेत्र की रहने वाली कलिता चुनाव से पहले चार घरों में घरेलू काम करती थीं और करीब 2500 रुपये प्रतिमाह कमाती थीं। एक अन्य बातचीत में उन्होंने बताया था कि वे दो घरों में काम कर लगभग 4500 रुपये तक कमा लेती थीं। सीमित आय के बावजूद उन्होंने अपने सपनों को कभी छोटा नहीं होने दिया।

प्रचार और काम—दोनों साथ

कलिता माझी चुनाव प्रचार के दौरान भी अपने काम से जुड़ी रहीं। वे सुबह 7 बजे तक घरों में काम करतीं और फिर प्रचार में निकल जातीं। जिन परिवारों के यहां वे काम करती थीं, उन्होंने भी उनका पूरा साथ दिया। हालांकि बाद में परिवार ने उन्हें सिर्फ चुनाव पर ध्यान देने की सलाह दी, तब जाकर उन्होंने काम छोड़कर प्रचार पर पूरा फोकस किया।

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परिवार का मिला साथ

कलिता ने बताया कि वे सुबह 5 बजे उठकर दिन की शुरुआत करती थीं। उनकी सास घर के कामों में मदद करती थीं, जिससे वे बाहर जाकर काम और प्रचार दोनों संभाल सकें। उनके बेटे पार्थ ने भी चुनाव अभियान में अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा उनके चुनाव एजेंट चंद्रनाथ बंद्योपाध्याय पर भी वे काफी निर्भर रहीं।

राजनीतिक पृष्ठभूमि से भी जुड़ाव

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हालांकि कलिता खुद राजनीति में नई थीं, लेकिन उनके जीजा कार्तिक बाग 2006 में औसग्राम से सीपीएम विधायक रह चुके हैं। हालांकि उन्होंने साफ कहा कि उनका उनसे कोई खास संपर्क नहीं है और उन्होंने अपनी पहचान खुद बनाई है।

कलिता माझी की यह जीत इस बात का प्रमाण है कि राजनीति में केवल बड़े संसाधन ही नहीं, बल्कि जमीनी जुड़ाव, संघर्ष और जनता का विश्वास भी जीत की सबसे बड़ी ताकत होता है।

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