दुनिया की एक बड़ी आबादी इस वक्त ‘हाइपरटेंशन’ (उच्च रक्तचाप) की चपेट में है। हाल ही में जारी एक वैश्विक विश्लेषण के अनुसार, पिछले 20 वर्षों में निम्न और मध्यम आय वाले देशों में हाइपरटेंशन के मरीजों की संख्या में 90% की भारी बढ़ोतरी देखी गई है। विशेषज्ञ इसे एक ऐसी “जिद्दी और घातक मौन महामारी” कह रहे हैं, जो धीरे-धीरे जान ले रही है।
वैश्विक आंकड़े: एक नजर में
अमेरिका के टुलाने विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 119 देशों के 60 लाख से अधिक लोगों पर आधारित 287 अध्ययनों का विश्लेषण कर ये तथ्य पेश किए हैं:
- कुल मरीज: साल 2020 तक दुनिया के करीब 1.71 अरब वयस्क हाइपरटेंशन से ग्रस्त थे।
- असमान वितरण: इनमें से 1.32 अरब लोग गरीब या विकासशील देशों (LMIC) से हैं, जबकि केवल 40 करोड़ लोग उच्च आय वाले देशों में हैं।
- नियंत्रण की दर: उच्च आय वाले देशों में 40.2% मरीजों का रक्तचाप नियंत्रित है, जबकि गरीब देशों में यह आंकड़ा मात्र 13.6% है।
भारत की स्थिति: नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट
भारत में उच्च रक्तचाप की समस्या तेजी से पैर पसार रही है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (2019-2020) के आंकड़ों के मुताबिक:
- 24% पुरुष हाइपरटेंशन का शिकार हैं।
- 21% महिलाएं इस गंभीर बीमारी से जूझ रही हैं।
20 सालों में कितना बदला परिदृश्य?
अध्ययन के अनुसार, साल 2000 से 2020 के बीच उच्च आय वाले देशों में जागरूकता 57.7% से बढ़कर 69.2%, उपचार 42.9% से बढ़कर 66.3% और नियंत्रण 16.4% से बढ़कर 40.2% हो गया है।
वहीं, निम्न और मध्यम आय वाले देशों में स्थिति अब भी चिंताजनक है। यहाँ जागरूकता 29.1% से 46.1%, उपचार 20.7% से 30.8% और नियंत्रण मात्र 6.4% से बढ़कर 13.6% तक ही पहुँच सका है।
क्षेत्रवार प्रभाव
रिपोर्ट के मुताबिक, हाइपरटेंशन का सबसे अधिक प्रचलन लैटिन अमेरिका, कैरेबियन और उप-सहारा अफ्रीका में देखा गया। हालांकि, मरीजों की सबसे बड़ी संख्या के मामले में पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र शीर्ष पर हैं, जिसके ठीक बाद दक्षिण एशिया का स्थान आता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि 2000 में हाइपरटेंशन के 70% अनियंत्रित मरीज गरीब देशों में थे, जो 2020 तक बढ़कर 83% हो गए हैं। यह उन देशों की स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी बोझ है जो संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं।
