विशेष रिपोर्ट: आस्था, आयुर्वेद और अनुशासन का संगम — संपन्न हुआ ‘सेंदरा पर्व’

Johar News Times
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जमशेदपुर/पूर्वी सिंहभूम: झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और प्रकृति के बीच के अटूट रिश्ते का प्रतीक ‘सेंदरा पर्व’ (शिकार उत्सव) इस वर्ष शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। पूर्वी सिंहभूम के ग्रामीण इलाकों से हजारों की संख्या में पारंपरिक हथियारों और तीर-धनुष से लैस ग्रामीण दलमा की तराई में जुटे, लेकिन इस बार की तस्वीर केवल शिकार की नहीं, बल्कि परंपरा के संरक्षण की रही।

परंपरा का आरंभ: वन देवी की आराधना

पर्व की शुरुआत दलमा के राजा रमेश हेम्ब्रम द्वारा वन देवी और स्थानीय देवी-देवताओं की विधिवत पूजा-अर्चना के साथ हुई। मान्यता है कि बिना अनुमति और पूजा के जंगल में प्रवेश अशुभ होता है। राजा ने प्रार्थना की कि पहाड़ पर चढ़ने वाले हजारों शिकारियों पर कोई विपत्ति न आए और सभी सुरक्षित घर लौटें।

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शिकार या जड़ी-बूटियों की खोज?

अक्सर बाहरी दुनिया सेंदरा को केवल जीव-जंतुओं के शिकार के रूप में देखती है, लेकिन दलमा के राजा रमेश हेम्ब्रम ने इस पर एक गहरा दृष्टिकोण साझा किया। उनके अनुसार:

“शिकार करना हमारा मुख्य उद्देश्य नहीं है। हमारे पूर्वजों ने इस परंपरा को इसलिए बनाया था ताकि हम जंगल के भीतर जा सकें और उन दुर्लभ जड़ी-बूटियों व औषधीय पौधों की पहचान कर सकें, जो मानव जीवन को बचाने के काम आते हैं। यह एक तरह से प्रकृति के साथ अपने ज्ञान को साझा करने का वार्षिक अभियान है।”

वन विभाग और ग्रामीणों के बीच का ‘सेतु’

इस वर्ष वन विभाग की सतर्कता और ग्रामीणों के सहयोग का एक अनूठा तालमेल देखने को मिला। जहाँ एक ओर वन विभाग जीव-जंतुओं की सुरक्षा के लिए तैनात था, वहीं आदिवासियों ने भी अपनी परंपरा को सीमित और अनुशासित रखते हुए संपन्न किया। दलमा के राजा ने वन विभाग के अधिकारियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके सहयोग से ही इस प्राचीन परंपरा का निर्वहन सुगम हो सका।

खुशहाली का प्रतीक: घर वापसी

पहाड़ से उतरते शिकारियों के जत्थे के चेहरे पर अपनी विरासत को निभाने का संतोष साफ दिखाई दिया।

  • धार्मिक अनुष्ठान: पहाड़ के नीचे स्थित देव स्थल पर हर शिकारी ने रुककर शीश नवाया और सुरक्षित वापसी के लिए आभार व्यक्त किया।
  • सामाजिक महत्व: सेंदरा से लौटने के बाद गाँवों में उत्सव का माहौल है। विशेषकर विवाहित शिकारियों की पत्नियां, जो उनके लौटने तक कठोर नियमों का पालन करती हैं, अब फिर से सुहागन की तरह सजकर अपने पति का स्वागत करेंगी और परिवार के साथ खुशियां मनाएंगी।

आपको बता दे कि दलमा वन्यजीव अभयारण्य लगभग 193 वर्ग किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है। यह समुद्र तल से करीब 3000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। घने जंगलों, ऊंची-नीची पहाड़ियों और गहरी खाइयों से घिरा यह क्षेत्र केवल झारखंड ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों के हाथियों का भी मुख्य गलियारा (Elephant Corridor) माना जाता है।

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शिकारियों के लिए चुनौतियां:

  1. कठिन चढ़ाई और पथरीले रास्ते: दलमा की पहाड़ियां काफी सीधी और पथरीली हैं। भीषण गर्मी के मौसम में तपते पत्थरों और कटीली झाड़ियों के बीच पैदल चढ़ाई करना शारीरिक रूप से बेहद थका देने वाला होता है।
  2. जंगली जानवरों का डर: यह पहाड़ हाथियों, भालू, तेंदुओं और जहरीले सांपों का घर है। घने जंगलों के बीच शिकारी अक्सर इन जंगली जानवरों के आमने-सामने आ जाते हैं, जिससे जान का जोखिम बना रहता है।
  3. पेयजल का संकट: चढ़ाई के दौरान पहाड़ के ऊपरी हिस्सों में पानी के स्रोत बेहद सीमित हैं। भीषण गर्मी में प्यास से जूझते हुए अपनी परंपरा को निभाना शिकारियों के साहस की असली परीक्षा होती है।
  4. भटकाव का खतरा: दलमा का जंगल इतना घना है कि जरा सी चूक होने पर रास्ता भटकने का डर रहता है। कई बार शिकारी मुख्य दल से बिछड़कर गहरे जंगलों में फंस जाते हैं।

इतनी भौगोलिक जटिलताओं और खतरों के बावजूद, हजारों ग्रामीणों का अपनी परंपरा के लिए यहाँ पहुंचना उनकी अडिग आस्था को दर्शाता है। प्रकृति की इन चुनौतियों को पार करते हुए, आदिवासियों की परंपरा को जोड़ते हुए — शांतिपूर्ण तरीके से शिकार यानी सेंदरा पर्व का समापन हुआ।


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