गर्मी में झारखंड के पारंपरिक खान-पान का सहारा, सेहत भी दुरुस्त और मन भी खुश

गर्मी में झारखंड के पारंपरिक खान-पान का सहारा, सेहत भी दुरुस्त और मन भी खुश

Johar News Times
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झारखंड में बढ़ती गर्मी और लू के प्रकोप के बीच लोग अब एक बार फिर पारंपरिक खान-पान की ओर लौट रहे हैं। खासकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में सदियों से प्रचलित देसी व्यंजन न सिर्फ शरीर को ठंडक देते हैं, बल्कि कई बीमारियों से बचाने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि मौसम के अनुसार खान-पान अपनाना स्वास्थ्य के लिए सबसे बेहतर उपाय है।

गर्मी के दिनों में सबसे ज्यादा पसंद किया जाने वाला व्यंजन माड़ भात है। चावल के पानी से तैयार यह हल्का भोजन शरीर को हाइड्रेट रखने के साथ पाचन तंत्र को भी मजबूत करता है। इसके साथ खाया जाने वाला चोखा—जिसमें आलू, बैंगन या टमाटर का उपयोग होता है—स्वाद के साथ पोषण भी देता है।

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इसके अलावा धान का चूड़ा को दही या गुड़ के साथ खाना गर्मी में बेहद लाभकारी माना जाता है। यह शरीर को तुरंत ऊर्जा देता है और पेट को हल्का रखता है। वहीं सत्तू घोल को प्राकृतिक एनर्जी ड्रिंक कहा जाता है, जो लू से बचाव करने के साथ शरीर में पानी की कमी नहीं होने देता।

गांवों में पकौड़ी कढ़ी भी खास तौर पर बनाई जाती है, जो हल्की और सुपाच्य होती है। इसमें मौजूद दही शरीर को ठंडा रखने में मदद करता है और पाचन क्रिया को बेहतर बनाता है।

डॉक्टरों और आहार विशेषज्ञों के अनुसार, पारंपरिक झारखंडी खान-पान पूरी तरह प्राकृतिक और संतुलित होता है। इसमें तेल-मसाले का कम उपयोग होता है और यह स्थानीय संसाधनों से तैयार किया जाता है, जिससे शरीर पर अतिरिक्त दबाव नहीं पड़ता। यही वजह है कि गर्मी के मौसम में पेट की समस्या, डिहाइड्रेशन और थकान जैसी दिक्कतों से बचने के लिए ये व्यंजन बेहद कारगर साबित होते हैं।

शहरी क्षेत्रों में भी अब लोग फास्ट फूड और कोल्ड ड्रिंक्स की जगह इन पारंपरिक विकल्पों को अपना रहे हैं। खासकर युवा वर्ग के बीच सत्तू घोल और धान का चूड़ा तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।

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स्थानीय लोगों का कहना है कि “हमारे पूर्वजों ने मौसम के अनुसार खान-पान की जो परंपरा बनाई थी, वही आज के समय में सबसे ज्यादा कारगर साबित हो रही है।” ऐसे में साफ है कि झारखंड का देसी स्वाद न केवल परंपरा का हिस्सा है, बल्कि यह सेहत का भी मजबूत आधार बनता जा रहा है।

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