हो भाषा और साहित्य के संरक्षण के लिए एकजुट हुए बुद्धिजीवी: ‘हो भाषा अकादमी’ के गठन की मांग

Johar News Times
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जमशेदपुर/कोल्हान:

कोल्हान क्षेत्र के हो भाषा के साहित्यकारों, लेखकों और प्रबुद्ध जनों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य ‘हो’ भाषा एवं साहित्य की वर्तमान चुनौतियों पर चर्चा करना और इसके संरक्षण हेतु राज्य सरकार के समक्ष ठोस मांगें रखना था।

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अकादमी के गठन और शिक्षकों की बहाली पर जोर

बैठक को संबोधित करते हुए झारखंड आंदोलनकारी टेमका जी ने कहा कि कोल्हान प्रमंडल के तीनों जिलों में ‘हो’ समाज एक बड़ी आबादी है, जिसका गौरवशाली इतिहास रहा है। राज्य निर्माण में इस समुदाय का अतुलनीय योगदान रहा है, लेकिन आज ‘हो’ भाषा और साहित्य की स्थिति चिंताजनक है।

बैठक के मुख्य बिंदु:

  • हो भाषा अकादमी की मांग: साहित्यकारों ने मांग की है कि राज्य सरकार अविलंब ‘हो भाषा अकादमी’ का गठन करे। इसके लिए समाज जमीन और अन्य आवश्यक सहयोग देने को तैयार है।
  • शिक्षकों की नियुक्ति: हालांकि हो भाषा को द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त है, लेकिन धरातल पर स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है। मांग की गई है कि प्राथमिक और उच्च स्तर पर भाषा शिक्षकों की तुरंत बहाली की जाए।
  • संसाधनों की उपलब्धता: विश्वविद्यालय स्तर पर आवश्यकता आधारित साहित्य निर्माण के लिए सरकार पर्याप्त बजट और संसाधन उपलब्ध कराए।

आठवीं अनुसूची और राष्ट्रीय पहचान

वक्ताओं ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि 1831-32 के कोल विद्रोह से लेकर झारखंड आंदोलन तक सबसे ज्यादा कुर्बानी देने वाले इस समुदाय की भाषा को अब तक भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है।

“झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में हो भाषा बोलने वालों की बड़ी संख्या है। हम तीनों राज्यों के साहित्यकारों को एक मंच पर लाकर राष्ट्रीय स्तर पर ‘हो साहित्य पुरस्कार’ की शुरुआत करेंगे ताकि लेखकों को उचित मान-सम्मान मिल सके।” – टेमका सोय , झारखंड आंदोलनकारी

मुख्यमंत्री को सौंपा जाएगा ज्ञापन

बैठक में यह निर्णय लिया गया कि एक प्रतिनिधिमंडल जल्द ही संवेदनशील मुख्यमंत्री से मुलाकात करेगा और ज्ञापन सौंपकर इन मांगों को रखेगा। साहित्यकारों का कहना है कि जहां एक ओर बड़े-बड़े कॉर्पोरेट घराने इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यहां की मूल भाषा और संस्कृति गरीबी और उपेक्षा के दौर से गुजर रही है।

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बैठक में झारखंड और ओडिशा के विभिन्न हिस्सों से आए साहित्यकार और बुद्धिजीवी शामिल हुए, जिन्होंने मातृभाषा के विकास के लिए सामूहिक आंदोलन का संकल्प लिया।

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