जनगणना में ‘सरना’ पहचान की मुहिम: आदिवासी समाज ने भरी हुंकार, घर-घर चलेगा जागरूकता अभियान

Johar News Times
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रांची: आगामी जनगणना को लेकर झारखंड के आदिवासी समुदायों, विशेषकर संताल आदिवासियों ने अपनी धार्मिक पहचान को लेकर आर-पार की लड़ाई का बिगुल फूंक दिया है। ‘माझी परगना महाल’ के नेतृत्व में आयोजित विभिन्न पंचायतों में यह सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया है कि जनगणना प्रपत्र में अलग कॉलम न होने के बावजूद, समाज का हर व्यक्ति धर्म के स्थान पर केवल ‘सरना’ ही अंकित कराएगा।

छह धर्मों के विकल्प पर जताया कड़ा विरोध

आदिवासी समाज में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश है कि केंद्र सरकार ने आगामी जनगणना में केवल छह धर्मों (हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, सिख और जैन) को ही विकल्प के रूप में रखा है। माझी बाबा भुगलू सोरेन के नेतृत्व में समाज ने स्पष्ट किया है कि प्रकृति-पूजक आदिवासियों की परंपराएं संगठित धर्मों से पूरी तरह भिन्न हैं, इसलिए उन्हें अलग पहचान मिलना उनका संवैधानिक अधिकार है।

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संविधान और इतिहास का दिया हवाला

आंदोलन का नेतृत्व कर रहे भुगलू सोरेन ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 का हवाला देते हुए कहा कि प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था चुनने की मौलिक स्वतंत्रता है। उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों को रखते हुए बताया:

  • 1951 की जनगणना: आदिवासियों के लिए अलग कॉलम और कोड संख्या 9 का प्रावधान था।
  • साजिश का आरोप: 1961 के बाद से इस पहचान को क्रमिक रूप से हटाया गया, जिसे समाज अपनी विशिष्ट पहचान मिटाने की साजिश मान रहा है।
  • पिछला रिकॉर्ड: 2011 की जनगणना में लगभग 50 लाख लोगों ने अपनी स्वेच्छा से धर्म के कॉलम में ‘सरना’ दर्ज कराया था।

गांवों में ‘माझी बाबा’ संभालेंगे कमान

अपनी जड़ों और अस्तित्व की रक्षा के लिए अब इस मुहिम को जमीनी स्तर पर ले जाया जा रहा है।

  1. पंचायत स्तर पर बैठकें: गांवों में पंचायतों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा रहा है।
  2. डोर-टू-डोर कैंपेन: स्वयंसेवक हर घर जाकर ग्रामीणों को समझाएंगे कि जब जनगणना कर्मी आएं, तो वे स्पष्ट रूप से अपना धर्म ‘सरना’ ही लिखवाएं।
  3. सांस्कृतिक पहचान: समाज का मानना है कि अलग कोड न होने से उनकी जनसांख्यिकीय स्थिति और सांस्कृतिक विरासत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

अस्तित्व की लड़ाई

यह मुहिम अब केवल एक नाम दर्ज कराने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह आदिवासियों के अस्तित्व और उनकी विशिष्ट पहचान को आधिकारिक मान्यता दिलाने की एक लंबी वैधानिक लड़ाई बन चुकी है। आदिवासी संगठनों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक ‘सरना धर्म कोड’ को स्थायी मान्यता नहीं मिलती, उनका संघर्ष जारी रहेगा।


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