संसद के आगामी मानसून सत्र से पहले कांग्रेस को दो राज्यों में राज्यसभा चुनाव के दौरान बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। झारखंड में पर्याप्त संख्याबल होने के बावजूद पार्टी अपने उम्मीदवार को नहीं जिता सकी, जबकि मध्य प्रदेश में तकनीकी कारणों से उम्मीदवार का नामांकन ही खारिज हो गया। दूसरी ओर, कर्नाटक में कांग्रेस ने शानदार रणनीति के दम पर विपक्षी खेमे में सेंध लगाकर बड़ी जीत दर्ज की।
झारखंड में गणित मजबूत, लेकिन राजनीति कमजोर
झारखंड राज्यसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन के पास दोनों सीटें जीतने के लिए पर्याप्त संख्या थी। मुख्यमंत्री आवास में बैठकों, मॉक पोल और रणनीतिक तैयारियों के बावजूद नतीजे उम्मीद के विपरीत रहे। झामुमो उम्मीदवार बैद्यनाथ राम की जीत तय मानी जा रही थी, लेकिन दूसरी सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा और एनडीए समर्थित निर्दलीय परिमल नाथवानी के बीच मुकाबला था। परिणाम में परिमल नाथवानी जीत गए, जबकि प्रणव झा हार गए। इससे गठबंधन के भीतर समन्वय और भरोसे पर सवाल खड़े हो गए हैं। राजनीतिक गलियारों में सबसे अधिक चर्चा कथित क्रॉस वोटिंग को लेकर है। कांग्रेस का दावा है कि उसके विधायक एकजुट रहे, जबकि राजद और माले भी गठबंधन धर्म निभाने की बात कह रहे हैं। ऐसे में वोटों का गणित कैसे बिगड़ा, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।
कांग्रेस के सामने कई असहज सवाल
कांग्रेस ने संगठन के कार्यकर्ता प्रणव झा को उम्मीदवार बनाकर कार्यकर्ताओं को संदेश देने की कोशिश की थी, लेकिन हार के बाद पार्टी दबाव में है। अब कांग्रेस को यह स्पष्ट करना होगा कि सहयोगी दलों का पूरा समर्थन मिला था या नहीं और यदि मिला था तो वोट आखिर गए कहां।
चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और परिमल नाथवानी की मुलाकात ने भी राजनीतिक चर्चाओं को हवा दी। विपक्ष इसे महागठबंधन के भीतर असहजता का संकेत बता रहा है।
बैद्यनाथ राम की जीत का सामाजिक संदेश
इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू झामुमो उम्मीदवार बैद्यनाथ राम की जीत भी रही। गुरुजी शिबू सोरेन के निधन से रिक्त हुई सीट पर दलित चेहरे को राज्यसभा भेजकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सामाजिक प्रतिनिधित्व का संदेश देने की कोशिश की है। इससे झामुमो को राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर लाभ मिला है।
मध्य प्रदेश में तकनीकी चूक से हाथ से निकली सीट
मध्य प्रदेश में कांग्रेस की वरिष्ठ नेता मीनाक्षी नटराजन का नामांकन जांच के दौरान खारिज हो गया। हलफनामे में एक पुराने न्यायिक मामले की जानकारी अधूरी होने के कारण उनका पर्चा रद्द कर दिया गया। कांग्रेस के भीतर इस बात को लेकर नाराजगी है कि इतनी वरिष्ठ नेता के नामांकन में ऐसी चूक कैसे हुई। पार्टी के कुछ नेताओं को इसमें अंदरूनी असंतोष और गुटबाजी की भी आशंका नजर आ रही है।
कर्नाटक में कांग्रेस की रणनीति रही सफल
जहां झारखंड और मध्य प्रदेश में कांग्रेस को निराशा मिली, वहीं कर्नाटक में पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया। कांग्रेस ने अपने सभी पांच उम्मीदवारों को विधान परिषद पहुंचाया और विपक्षी दलों के कई वोट अपने पक्ष में खींचने में सफलता हासिल की। पार्टी के पास 135 विधायक थे, लेकिन उम्मीदवारों को 151 वोट मिले। इससे स्पष्ट हुआ कि भाजपा और जेडीएस के कुछ विधायकों ने भी कांग्रेस के पक्ष में मतदान किया। कांग्रेस नेतृत्व ने इसे सटीक राजनीतिक प्रबंधन और रणनीति का परिणाम बताया।
2029 की राजनीति के लिए बड़ा संकेत
झारखंड और मध्य प्रदेश के नतीजों ने कांग्रेस के सामने गठबंधन प्रबंधन, संगठनात्मक समन्वय और चुनावी रणनीति को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं कर्नाटक की सफलता ने दिखाया कि मजबूत राजनीतिक प्रबंधन से सीमित संख्या बल को भी बढ़त में बदला जा सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि झारखंड का परिणाम सरकार के बहुमत पर असर नहीं डालता, लेकिन इससे एनडीए को मनोवैज्ञानिक बढ़त जरूर मिली है। वहीं कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को आने वाले चुनावों से पहले आपसी विश्वास और समन्वय को मजबूत करना होगा।
