पश्चिम सिंहभूम जिले से एक बेहद निराशाजनक और बड़ा झटका देने वाला मामला सामने आया है। तमाम कोशिशों और प्रशासनिक प्रयासों के बाद भी आखिरकार आजाद भारत की पहली सीमेंट कंपनी एसीसी लिमिटेड की ‘चाईबासा सीमेंट वर्क्स’ (झींकपानी प्लांट) को बंद करने की वैधानिक प्रक्रिया शुरू हो गई है। कंपनी प्रबंधन द्वारा 15 जून सोमवार को प्लांट परिसर में बंदी का आधिकारिक नोटिस चिपका दिया गया है, जिससे क्षेत्र के लोगों में मायूसी छा गई है।
16 अगस्त से थम जाएंगे पहिए, 74 परिवारों पर सीधा संकट
प्रबंधन द्वारा जारी नोटिस के अनुसार, 16 अगस्त 2026 से संयंत्र का परिचालन पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा। एसीसी कंपनी के इस फैसले से सीधे तौर पर 74 स्थायी कर्मचारियों की सेवा समाप्त हो जाएगी, जिससे उनके परिवारों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। इसके अलावा प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जुड़े हजारों स्थानीय व्यापारियों, डंपर मालिकों और मजदूरों के आर्थिक भविष्य पर भी बड़ा सवालिया निशान लग गया है।
प्लांट बंद होने के 3 मुख्य कारण
कंपनी प्रबंधन ने इस ऐतिहासिक और पुराने संयंत्र को हमेशा के लिए बंद करने के पीछे निम्नलिखित कारण बताए हैं:
- कंपनी की स्थानीय खदानों में सीमेंट उत्पादन के लिए सबसे जरूरी कच्चे माल यानी चूना पत्थर का भंडार पूरी तरह समाप्त हो चुका है।
- कच्चे माल को बाहर से मंगाने और अन्य कारणों से उत्पादन लागत अब काफी बढ़ चुकी है, जिससे प्लांट को चलाना घाटे का सौदा साबित हो रहा था।
- यह प्लांट साल 1946 से स्थापित है। इसकी मशीनें बेहद पुरानी और आउटडेटेड हो चुकी हैं, जिससे उत्पादकता पर असर पड़ रहा था।
प्रयास रहे विफल, स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश
हालांकि, झींकपानी प्लांट के बंद होने की चर्चा पिछले डेढ़-दो सालों से चल रही थी। इस दौरान राज्य सरकार, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और जिला प्रशासन ने कई स्तरों पर इस ऐतिहासिक कारखाने को बचाने का प्रयास किया, लेकिन अंततः कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया।
संयंत्र बंद होने के इस फैसले पर ‘एसीसी बचाओ संघर्ष मोर्चा’ के संयोजक रमेश बालमुचू और एसीसी सीमेंट कंपनी को अपनी पुश्तैनी जमीन देने वाले परिवार के सदस्य तुराम बिरुली समेत स्थानीय व्यापारियों ने गहरी चिंता और आक्रोश व्यक्त किया है। स्थानीय प्रबुद्ध जनों का कहना है कि यह केवल एक फैक्ट्री का बंद होना नहीं है, बल्कि पूरे कोल्हान क्षेत्र की रीढ़ माने जाने वाले एक औद्योगिक युग का अंत है। इसे दोबारा शुरू कराने के लिए वैकल्पिक रास्तों और सरकार के हस्तक्षेप की मांग एक बार फिर तेज हो गई है।
