महिलाओं और यौन हिंसा की पीड़िताओं के अधिकार, सुरक्षा, सम्मान और न्याय को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने एक बेहद ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य के सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में विवादित ‘टू-फिंगर टेस्ट’ पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है। हाईकोर्ट ने साफ लहजे में चेतावनी दी है कि इस आदेश का उल्लंघन करने वाले डॉक्टरों या चिकित्सा कर्मियों के खिलाफ न सिर्फ कड़ी कानूनी कार्रवाई होगी, बल्कि इसे ‘गंभीर पेशेवर कदाचार’ मानकर उनका लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है।
पीड़िताओं को दोषी ठहराने की मानसिकता पर कोर्ट सख्त
मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनाक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने यौन हिंसा पीड़िताओं की सुरक्षा और पुनर्वास से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया। खंडपीठ ने समाज की सोच पर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा:
“यह परीक्षण न केवल पूरी तरह अवैज्ञानिक है, बल्कि पीड़िताओं की गरिमा, निजता और सम्मान के भी खिलाफ है। अक्सर समाज में पीड़िताओं को ही उपहास और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। न्यायिक व्यवस्था का उद्देश्य सिर्फ दोषियों को सजा देना नहीं, बल्कि पीड़िताओं के प्रति समाज की सोच में सकारात्मक बदलाव लाना भी है।”
हाईकोर्ट के फैसले की 4 बड़ी बातें, जो बदलेंगी व्यवस्था:
1. ‘जीरो एफआईआर’ अब पुलिस की कानूनी जिम्मेदारी: अदालत ने पुलिस विभाग को सख्त हिदायत दी है कि किसी भी यौन अपराध या पॉक्सो मामले में क्षेत्राधिकार का बहाना बनाकर केस दर्ज करने से इनकार नहीं किया जा सकता। पुलिस को तुरंत ‘जीरो एफआईआर’ दर्ज करनी होगी, इसमें किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
2. रेप पीड़िताओं के बच्चों को मिलेगी मुफ्त शिक्षा: अदालत ने राज्य सरकार को एक बेहद संवेदनशील निर्देश दिया है। दुष्कर्म की घटनाओं से जन्मे बच्चों को 12वीं कक्षा तक पूरी तरह निःशुल्क शिक्षा दी जाएगी। हर जिले में एक नोडल अधिकारी इन बच्चों की पढ़ाई और विकास की निगरानी करेगा। इतना ही नहीं, यदि ऐसा कोई बच्चा भविष्य में IIT, NIT, AIIMS या IIM जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में चुना जाता है, तो उसकी उच्च शिक्षा का पूरा खर्च सरकार उठाएगी।
3. कक्षा 6 से 12वीं तक की छात्राओं को आत्मरक्षा की ट्रेनिंग: हाईकोर्ट ने सरकारी स्कूलों में कक्षा छह से बारहवीं तक की छात्राओं के लिए आत्मरक्षा प्रशिक्षण अनिवार्य करने का निर्देश दिया है। लड़कियों को दैनिक उपयोग की वस्तुओं (जैसे पेन, बैग, चाबी) के माध्यम से आत्मरक्षा के व्यावहारिक तरीके सिखाए जाएंगे।
क्या है ‘टू-फिंगर टेस्ट’ और क्यों लगा प्रतिबंध?
‘टू-फिंगर टेस्ट’ एक अत्यंत विवादित और पुराना तरीका है, जिसमें बलात्कार पीड़िता की शारीरिक जांच के दौरान डॉक्टर अपनी दो उंगलियों के सहारे यह अनुमान लगाने की कोशिश करते थे कि पीड़िता यौन रूप से सक्रिय रही है या नहीं।
चिकित्सा विज्ञान और विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे बहुत पहले ही अमानवीय, दर्दनाक और वैज्ञानिक आधार से रहित घोषित कर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद अब झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य में इसे पूरी तरह गैर-कानूनी घोषित कर दिया है।
