“साहब! ये अंडरपास है या जनता को डुबाने की साजिश?” बड़की बोआ रेलवे अंडरपास बना ‘स्विमिंग पूल’

पहली बारिश ने ही रेलवे के दावों और उसके 'विकास मॉडल' की ऐसी पोल खोली है कि देखने वाले हैरान हैं।

Johar News Times
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पहली बारिश ने ही रेलवे के दावों और उसके ‘विकास मॉडल’ की ऐसी पोल खोली है कि देखने वाले हैरान हैं। महुदा के बड़की बोआ रेलवे अंडरपास की तस्वीरें इस वक्त सोशल मीडिया पर रेलवे प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर रही हैं। हल्की बारिश के बाद अंडरपास किसी सड़क की तरह नहीं, बल्कि एक आलीशान स्विमिंग पूल में तब्दील हो गया है। हालात इस कदर बदतर हो गए कि वाहनों की आवाजाही पूरी तरह ठप हो गई और स्थानीय बच्चे इस भरे पानी में तैरते हुए नजर आए। रेलवे के इस अजूबे निर्माण पर तंज कसते हुए स्थानीय लोगों ने कहा, “अगर रेलवे चाहे तो यहां नाव चलाने की भी व्यवस्था कर दे, ताकि जनता इस अनोखे विकास के साथ नौकायन का आनंद भी उठा सके।”

मुख्य बिंदु: जो इस ‘विकास’ की पोल खोलते हैं

  • जानलेवा तालाब: करोड़ों रुपये की लागत से बने इस अंडरपास में जल निकासी (ड्रेनेज) की कोई व्यवस्था नहीं है।
  • ठप हुआ आवागमन: पानी भरने से दोनों तरफ का संपर्क टूट गया है, गाड़ियां रेंगने को मजबूर हैं या रास्ता बदलने पर मजबूर हैं।
  • अधिकारियों की चुप्पी: इतनी बड़ी लापरवाही के बाद भी रेलवे प्रशासन और ठेकेदार पूरी तरह मौन हैं।
  • जनता का आक्रोश: ग्रामीण पहले भी इस मुद्दे पर डीआरएम का पुतला फूंक चुके हैं, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा।

“ये अंडरपास नहीं, ठेकेदारों की कमाई का तैरता सबूत है!”

स्थानीय ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। पहली ही बारिश में अधिकारियों और ठेकेदारों के दावों की चमक पानी-पानी हो गई। जनता अब सीधे तौर पर निर्माण की गुणवत्ता और भ्रष्टाचार पर सवाल उठा रही है।

रेलवे वालों ने सड़क नहीं बनाई साहब… लगता है ‘स्विमिंग ट्रेनिंग सेंटर’ खोल दिया है। फर्क बस इतना है कि यहां टिकट की जगह हम लोगों को अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ रही है!” — एक आक्रोशित स्थानीय ग्रामीण

आंदोलन के बाद भी सोया है रेलवे प्रशासन

आपको बता दें कि यह समस्या नई नहीं है। कुछ दिन पूर्व ही ग्रामीणों ने इस गंभीर समस्या को लेकर बड़ा धरना-प्रदर्शन किया था। पूर्व में डीआरएम का पुतला दहन कर विरोध भी जताया जा चुका है। इसके बावजूद रेलवे प्रशासन की चुप्पी टूटने का नाम नहीं ले रही है, जिससे इलाके में कभी भी जन-आक्रोश भड़क सकता है।

“जनता पूछ रही — सड़क बनाई थी या मछली पालन केंद्र?”

जब भी इस मुद्दे पर अधिकारियों से बात करने की कोशिश की जाती है, तो वे जिम्मेदारी एक-दूसरे पर टालते नजर आते हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि इस रिपोर्ट के बाद भी रेलवे प्रशासन की नींद खुलती है या फिर हर बारिश में बड़की बोआ की जनता को इसी “सरकारी स्विमिंग पूल” में डूबने और जान जोखिम में डालने के लिए छोड़ दिया जाएगा।

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