गालूडीह में आज श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा रोहिण परब, खेती की शुरुआत के प्रतीक का पर्व

गालूडीह में आज श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा रोहिण परब, खेती की शुरुआत के प्रतीक का पर्व

Johar News Times
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गालूडीह और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में गुरुवार को पारंपरिक “रोहिण परब” श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है । यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि खेती, प्रकृति, मिट्टी और ग्रामीण जीवन से जुड़ी सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। पर्व को लेकर गांवों में तैयारियां पूरी कर ली गई हैं।

खेती की शुरुआत से जुड़ा है यह पर्व
परंपरा के अनुसार किसान इस दिन अपने खेतों में जाकर “ढाई बार हल चलाकर” कृषि कार्य का शुभारंभ करते हैं। इसके बाद धान के बीज बोने की प्रक्रिया शुरू की जाती है। ग्रामीण मान्यताओं के अनुसार चंद्रमा की चाल और मौसम के संकेतों के आधार पर खेती का अनुमान लगाया जाता था।

कुड़माली संस्कृति में विशेष महत्व
कुड़माली संस्कृति और राढ़ क्षेत्र के लोक लेखक व शोधकर्ता मनोरंजन महतो के अनुसार रोहिण परब राढ़ क्षेत्र का एक प्रमुख कृषि पर्व है। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी सोशल मीडिया की दुनिया में अपनी असली संस्कृति को भूलती जा रही है, जबकि यह पर्व प्रकृति और जीवन से जुड़ने का संदेश देता है। उनके अनुसार राढ़ क्षेत्र में 12 महीनों में 13 प्रमुख पर्व मनाए जाते हैं, जिनमें रोहिण परब का विशेष महत्व है। “रहन” शब्द से “रहइन” शब्द बना है, जिसका अर्थ सुरक्षा और प्रकृति आधारित जीवनशैली से जुड़ा माना जाता है। लोक मान्यताओं के अनुसार कृषि संस्कृति की शुरुआत अमरकंटक और नर्मदा घाटी क्षेत्र से मानी जाती है, जबकि मध्य प्रदेश, कांचीपुरम और बंगाल में भी इसके प्रमाण मिलते हैं।

खेत-घर की सुरक्षा के लिए विशेष परंपराएं
इस पर्व में मिट्टी, गोबर और धान के बीज का विशेष महत्व होता है। किसान खेत और घर की सुरक्षा के लिए पूजा करते हैं और मिट्टी को घर के चारों ओर छिड़कते हैं। धान के बीज को गोबर और मिट्टी के साथ शुद्ध कर खेतों में बोया जाता है, ताकि फसल को कीट-पतंगों और विषैले जीवों से सुरक्षा मिल सके।

सामूहिक पूजा और पारंपरिक आयोजन
ग्रामीण क्षेत्रों में इस अवसर पर सामूहिक पूजा, नाच-गान और पारंपरिक रीति-रिवाजों का आयोजन किया जाता है। कई जगह लोग सादा भोजन कर अच्छी वर्षा और बेहतर फसल की कामना करते हैं।

20 दिनों में तैयार होता है बीज, फिर शुरू होती है रोपनी
लोक कलाकार मनोरंजन महतो के अनुसार रोहिण परब के दिन बोया गया धान का बीज लगभग 20 दिनों में चारे के रूप में तैयार हो जाता है। इसके बाद आषाढ़ संक्रांति के समय धान की रोपनी शुरू होती है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में धान को “किसान का एटीएम” माना जाता है, जिससे जरूरत पड़ने पर आर्थिक जरूरतें पूरी की जाती हैं।

पारंपरिक भोजन और धार्मिक मान्यता
इस दिन “रोहिन फल” खाने और घरों में पीठा बनाने की परंपरा है। कुछ स्थानों पर मुर्गे-बतख की बलि देने की भी धार्मिक परंपरा बताई जाती है। मान्यता है कि इससे विषैले जीव-जंतुओं से सुरक्षा मिलती है। गालूडीह क्षेत्र में आज भी रोहिण परब ग्रामीण संस्कृति, परंपरा और कृषि जीवन की पहचान बना हुआ है, जिसे लोग श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं।

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