नई दिल्ली: लोकसभा में दो दिनों की लंबी चर्चा के बाद महिला आरक्षण (131वां संशोधन) विधेयक और परिसीमन से जुड़े अन्य विधेयक गिर गए हैं। सदन में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत न मिल पाने के कारण यह बिल 54 वोटों से पिछड़ गया। इस ऐतिहासिक घटनाक्रम पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है।
1. सत्ता पक्ष (सरकार): “विपक्ष ने महिलाओं के हितों पर प्रहार किया”
सरकार की ओर से गृह मंत्री अमित शाह ने मोर्चा संभालते हुए बिल गिरने का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ा है। उनके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
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निंदनीय कदम: अमित शाह ने कहा कि महिलाओं को आरक्षण देने के बिल को गिरा देना समझ और कल्पना से परे है। यह बेहद निंदनीय है।
इतिहास खुद को दोहरा रहा है: उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने यह पहली बार नहीं किया है। उनकी सोच हमेशा से महिला हितों के खिलाफ रही है।
जनता मांगेगी हिसाब: उन्होंने चेतावनी दी कि देश की महिलाएं सब देख रही हैं। जब विपक्ष वोट मांगने जाएगा, तो ‘मातृशक्ति’ उनसे इस रुकावट का हिसाब जरूर मांगेगी।
संकल्प अडिग: सरकार का कहना है कि उनका लक्ष्य सिर्फ 2029 नहीं, बल्कि हर स्तर पर महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करना है।
2. विपक्ष (इंडिया गठबंधन): “हमने संविधान पर होने वाले आक्रमण को रोका”
विपक्ष की ओर से राहुल गांधी ने सरकार के इरादों पर सवाल उठाए और बिल के गिरने को संविधान की जीत बताया:
संविधान की रक्षा: राहुल गांधी ने कहा कि यह केवल महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं था, बल्कि हिंदुस्तान के राजनीतिक और चुनावी ढांचे को बदलने की एक कोशिश थी। यह संविधान पर आक्रमण था जिसे हमने रोक दिया।
असंवैधानिक तरीका: विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने दक्षिण भारतीय राज्यों का अनुपात बिगाड़ने और असंवैधानिक तरीके से परिसीमन लागू करने के लिए इस बिल का सहारा लिया था।
इंडिया गठबंधन की जीत: राहुल गांधी ने इसे संविधान और इंडिया गठबंधन की जीत करार दिया।
3. सदन का गणित: क्यों गिरा बिल?
बिल पास कराने के लिए लोकसभा में जो स्थिति रही, वह इस प्रकार है:
विवरण
संख्या
कुल सदस्य (वर्तमान)
540
मतदान के दौरान उपस्थित
528
बिल पास कराने के लिए जरूरी (2/3 बहुमत)
352
पक्ष में पड़े वोट
298
विरोध में पड़े वोट
230
हार का अंतर
54 वोट
4. आगे की राह: अब क्या होगा?
विधेयक गिरने के बाद अब महिला आरक्षण के भविष्य पर सवालिया निशान लग गया है:
विलंब: अब यह बिल 2029 के चुनाव में लागू होना मुश्किल लग रहा है। अब इसके 2034 तक खिंचने के आसार हैं।
पुनः प्रस्तुतीकरण: सरकार के पास विकल्प है कि वह अगले मॉनसून या बजट सत्र में संशोधनों के साथ बिल को फिर से पेश करे।
राजनीतिक चुनौतियां: सरकार को अब राज्यसभा में भी बहुमत जुटाने और विपक्ष के साथ आम सहमति बनाने की दिशा में काम करना होगा।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने आधिकारिक घोषणा की है कि आवश्यक समर्थन न मिलने के कारण विधायी प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इसके बाद सरकार ने बाकी दो संबंधित विधेयकों पर भी मतदान न कराने का निर्णय लिया।
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