सरायकेला: अभिजीत इंफ्रास्ट्रक्चर और आदिवासी जमीन सौदा; वादों की ‘फाइल’ में दबे रैयतों के हक, अर्जुन मुंडा की मांग ने फिर गरमाया मुद्दा

Johar News Times
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सरायकेला/खरसावां: झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले में आदिवासी जमीन के औद्योगिक हस्तांतरण का मामला एक बार फिर कानूनी और सामाजिक विवादों के घेरे में है। अभिजीत इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड और स्थानीय रैयतों के बीच हुए जमीन के एकरारनामों (Agreements) ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनका सीधा संबंध सीएनटी एक्ट (CNT Act) और आदिवासी अधिकारों से है।

क्या है जमीन सौदे का पूरा मामला?

सामने आए दस्तावेजों के अनुसार, खरसावां अंचल के टोटातालबादी और बेगनाउंट मौजा की कीमती जमीन कंपनी को औद्योगिक उपयोग के लिए सौंपी गई थी।

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  • टोटातालबादी मौजा: यहाँ अरकितो नायक द्वारा लगभग 1.48 एकड़ जमीन कंपनी को दी गई।
  • कीमत: जमीन की कीमत महज दो लाख रुपये प्रति एकड़ तय की गई थी। एकरारनामे में यह उल्लेख किया गया है कि रैयतों ने अपनी मर्जी से जमीन दी है और भविष्य के किसी भी विवाद की जिम्मेदारी उनकी होगी।

सुनहरे वादे बनाम जमीनी हकीकत

जमीन लेते समय कंपनी ने विस्थापितों के लिए वादों की झड़ी लगा दी थी, जिनमें प्रमुख थे:

  • रोजगार: योग्यता के अनुसार नौकरी और मृत्यु की स्थिति में आश्रित को रोजगार।
  • पेंशन: सेवानिवृत्ति के बाद परिवार के एक सदस्य को नौकरी।
  • सुविधाएं: अस्पताल, स्कूल, तकनीकी संस्थान, बिजली और शुद्ध पेयजल की व्यवस्था।

हकीकत: स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों बीत जाने के बाद भी इनमें से अधिकांश वादे सिर्फ कागजों तक सीमित हैं। न तो तकनीकी संस्थान बने और न ही क्षेत्र के युवाओं को स्थायी रोजगार मिला।

कानूनी पेंच और ‘लैंड बैंक’ पर सवाल

झारखंड में आदिवासी जमीन का गैर-आदिवासी या व्यावसायिक उपयोग के लिए हस्तांतरण हमेशा से सख्त नियमों के अधीन रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह हस्तांतरण छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) की धाराओं के अनुरूप था? अर्जुन मुंडा द्वारा उठाए गए मुद्दे ने इस बहस को और तेज कर दिया है।

“यदि उद्योग स्थापित नहीं हुआ और समझौते की शर्तें पूरी नहीं हुईं, तो जमीन मूल रैयतों को लौटाई जानी चाहिए।”अर्जुन मुंडा, पूर्व केंद्रीय मंत्री (सितंबर 2024)

दस्तावेजों की वैधता पर बहस

हाल के दिनों में कंपनी से जुड़े कुछ दस्तावेजों की वैधता और पारदर्शिता पर भी उंगलियां उठी हैं। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह मामला केवल जमीन की खरीद-बिक्री का नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय और आदिवासी अस्तित्व की सुरक्षा का मुद्दा है।

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ग्रामीणों का बढ़ता आक्रोश

क्षेत्र में आए दिन होने वाले विरोध प्रदर्शन इस बात का प्रमाण हैं कि स्थानीय लोग अब अपने अधिकारों के प्रति सजग हो रहे हैं। उनका कहना है कि यदि उद्योग धरातल पर नहीं उतरा, तो उनकी उपजाऊ जमीन उन्हें वापस मिलनी चाहिए ताकि वे अपनी आजीविका फिर से शुरू कर सकें।


जोहार न्यूज़ टाइम्स इस संवेदनशील मुद्दे पर अपनी पैनी नज़र बनाए हुए है। प्रशासन और कंपनी का पक्ष आने पर हम उसे भी प्रमुखता से दिखाएंगे। joharnewstimes.com

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