सरायकेला-खरसावां समेत झारखंड और पश्चिम बंगाल के कई हिस्सों में इन दिनों पारंपरिक जनजातीय परब “रहेइन डाहा” की तैयारी और अनुष्ठान शुरू हो गए हैं। जेठ माह की भीषण गर्मी और उमस के बीच मनाया जाने वाला यह परब कृषिजीवी जनजातीय समाज की प्रकृति आधारित जीवनशैली, कृषि परंपरा और लोकविश्वास का जीवंत प्रतीक माना जाता है।
जनजातीय समाज में “रहेइन” केवल एक पर्व नहीं, बल्कि खेती की शुरुआत, पूर्वजों की आराधना और प्रकृति के प्रति आस्था का उत्सव है। मान्यता है कि जेठ महीने की 13 तारीख को रहेइन मनाने के बाद बीजारोपण कार्य शुरू होता है। इसके एक दिन पूर्व “देब रहिन” के रूप में पूर्वजों का आह्वान किया जाता है।
परंपरा के अनुसार “धान पुनहा” के माध्यम से खेतों में सबसे पहले धान का बीज डाला जाता है। इसके बाद मकई, तिल, खीरा, बरबटी और अन्य फसलों की बोआई आरंभ होती है। खेत में बीज डालने से पहले पूर्वजों, धरती माता और ग्राम देवताओं की पूजा की जाती है ताकि अच्छी फसल और समृद्धि प्राप्त हो सके।
रहेइन डाहा से जुड़े कई लोकविश्वास आज भी गांवों में प्रचलित हैं। घरों के चारों ओर गोबर से “रहिन नुउढ़ा” बनाकर सुरक्षात्मक रेखा खींची जाती है। मान्यता है कि इससे विषैले जीव-जंतु घर में प्रवेश नहीं करते। वहीं “रहिन माटी” को विषहरण का प्रतीक माना जाता है और बच्चों की सुरक्षा के लिए “रहिन दअड़ि” बांधने की परंपरा भी निभाई जाती है।
आधुनिकता के दौर में भी यह परब जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान, कृषि परंपरा और प्रकृति से गहरे संबंध को जीवित रखे हुए है।
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