रांची/सरायकेला : झारखंड के कई जिलों में रसोई गैस (LPG) की भारी किल्लत ने आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। राजधानी रांची और सरायकेला में स्थिति इतनी विकराल हो चुकी है कि लोग आधी रात से ही गैस गोदामों के बाहर पहरेदारी करने को मजबूर हैं। बुकिंग के हफ्तों बाद भी होम डिलीवरी न होने से उपभोक्ताओं का धैर्य जवाब दे रहा है।

रांची: सिलेंडर की ‘लाइन’ में कट रही रातें
राजधानी के धुमसाटोली (चुटिया) इलाके में शनिवार को अव्यवस्था की चरम तस्वीर देखने को मिली। इंद्रप्रस्थ गैस एजेंसी के बाहर सैकड़ों उपभोक्ता भीषण गर्मी में घंटों अपनी बारी का इंतजार करते दिखे।
- रात 1 बजे से कतार: होम डिलीवरी सेवा ठप होने के कारण लोग रात के अंधेरे में ही गैस एजेंसी पहुंच गए।
- सिलेंडर पर पत्थर और कपड़ा: थकान से चूर लोग जब धूप में खड़े नहीं रह सके, तो उन्होंने अपनी बारी सुरक्षित करने के लिए सिलेंडरों पर पत्थर रख दिए या कपड़े बांध दिए और खुद छांव की तलाश में भटकते रहे।
- सड़क जाम: इससे पहले महादेव मंडप के पास आक्रोशित जनता ने गैस संकट के विरोध में लगभग 6 घंटे तक सड़क जाम कर अपना विरोध दर्ज कराया था।
सरायकेला: जनप्रतिनिधि उतरे मैदान में, सोमवार तक का अल्टीमेटम
सरायकेला जिला मुख्यालय में भी हालात बेकाबू हैं। जनता के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए नगर पंचायत अध्यक्ष मनोज कुमार चौधरी ने स्वयं गैस गोदाम का औचक निरीक्षण किया।

- प्रशासनिक हस्तक्षेप: अध्यक्ष ने गैस अधिकारियों के साथ बैठक कर सोमवार तक हर हाल में आपूर्ति सुचारु करने का निर्देश दिया है।
- कालाबाजारी पर प्रहार: उन्होंने आशंका जताई कि संकट के बीच गैस की कालाबाजारी हो रही है। प्रशासन को नियमित छापेमारी करने और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करने का सुझाव दिया गया है।
- नीतियों पर सवाल: मनोज चौधरी ने केंद्र सरकार की नीतियों पर निशाना साधते हुए कहा कि “जमीनी हकीकत सरकारी दावों से बिलकुल अलग और डरावनी है।”
चूल्हे के साथ ‘धंधा’ भी मंदा: व्यावसायिक संकट
गैस की इस किल्लत ने केवल घरों की रसोई ही नहीं, बल्कि मध्यम वर्ग की आजीविका पर भी चोट की है:
- छोटे व्यवसायी प्रभावित: कमर्शियल गैस न मिलने के कारण होटल, ठेला और छोटे रेस्तरां बंद होने की कगार पर हैं।
- आर्थिक मार: स्वरोजगार करने वाले वर्ग के सामने अब रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।
निष्कर्ष: हालांकि प्रशासन और गैस एजेंसियों ने सोमवार तक स्थिति सामान्य होने का भरोसा दिलाया है, लेकिन पिछले एक महीने से जारी इस प्रताड़ना ने उपभोक्ताओं के भरोसे को पूरी तरह तोड़ दिया है। अब सबकी निगाहें सोमवार पर टिकी हैं कि क्या वाकई चूल्हे जलेंगे या कतारें और लंबी होंगी।









