हेमंत सोरेन की उड़ान पर ‘ब्रेक’: असम में पीएम के कार्यक्रम का हवाला देकर रैलियों की अनुमति रद, फोन से किया संबोधन

Johar News Times
3 Min Read

रांची: असम विधानसभा चुनाव 2026 के हाई-वोल्टेज प्रचार के बीच एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। झारखंड के मुख्यमंत्री और जेएमएम (JMM) के स्टार प्रचारक हेमंत सोरेन को असम के रोंगोनदी और चाबुआ में चुनावी रैलियां करने की अनुमति नहीं दी गई। प्रशासन ने इसके पीछे प्रधानमंत्री के कार्यक्रम और सुरक्षा प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए उनके हेलीकॉप्टर को उड़ान भरने से रोक दिया।

प्रमुख घटनाक्रम: मोबाइल बना प्रचार का जरिया

निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, सीएम हेमंत सोरेन को आदिवासी बहुल क्षेत्रों में जनसभाएं करनी थीं। ऐन वक्त पर अनुमति रद्द होने के कारण वे आयोजन स्थल पर नहीं पहुँच सके। इसके बाद, सोरेन ने मोबाइल फोन के माध्यम से जनता को संबोधित किया।

- Advertisement -
Ad image

उन्होंने जनता से कहा:

“प्रधानमंत्री के कार्यक्रम का बहाना बनाकर हमें जनता के बीच जाने से रोका जा रहा है। यह लोकतंत्र को दबाने की कोशिश है, लेकिन हम झुकेंगे नहीं। वे हमारे हेलीकॉप्टर रोक सकते हैं, हमारी आवाज़ नहीं।”

विपक्ष का आरोप: सरकारी तंत्र का दुरुपयोग

हेमंत सोरेन ने इस घटना को संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि:

  • विपक्षी नेताओं को प्रचार करने से रोकने के लिए जानबूझकर प्रशासनिक अड़चनें पैदा की जा रही हैं।
  • इससे पहले उनकी पत्नी और पार्टी नेता कल्पना सोरेन की सभाओं में भी इसी तरह की बाधाएं डाली गई थीं।
  • यह सीधे तौर पर आदिवासी समाज के नेतृत्व को कुचलने का प्रयास है।

JMM का असम दांव और चुनावी समीकरण

गौरतलब है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) इस बार असम चुनाव में बेहद सक्रिय है। पार्टी विशेष रूप से चाय बागान (Tea Garden) क्षेत्रों और झारखंडी मूल के आदिवासियों के बीच अपनी पैठ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। हेमंत सोरेन की इन रैलियों को इन क्षेत्रों में भाजपा और कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा था।

प्रशासनिक रुख

स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि प्रधानमंत्री के दौरे के समय हवाई क्षेत्र (Airspace) और सुरक्षा प्रोटोकॉल के कड़े नियम लागू होते हैं, जिसके चलते अन्य वीवीआईपी (VVIP) उड़ानों को प्रतिबंधित किया गया।

- Advertisement -
Ad image

अब देखना यह होगा कि मतदान से ठीक पहले इस ‘प्रतिबंध’ को हेमंत सोरेन किस तरह चुनावी मुद्दा बनाकर आदिवासियों के बीच सहानुभूति बटोरने में कामयाब होते हैं।


Share This Article