देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की एक कथित टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर शुरू हुआ विवाद अब एक बड़े डिजिटल आंदोलन और व्यंग्य में बदल चुका है। इंटरनेट यूजर्स ने इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देते हुए एक नया पैरोडी अकाउंट तैयार किया है, जिसे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम दिया गया है। यह पेज इस समय इंटरनेट पर जबरदस्त तरीके से वायरल हो रहा है।
महज 24 घंटे में उमड़ा जनसैलाब
डिजिटल रिपोर्ट्स के अनुसार, लॉन्च होने के महज 24 घंटे के भीतर ही इस पैरोडी पेज ने 15,000 से अधिक फॉलोअर्स हासिल कर लिए हैं। वहीं, इससे जुड़ने वाले कुल सदस्यों की संख्या 40,000 के आंकड़े को पार कर गई है। खुद को एक व्यंग्यात्मक मंच बताने वाला यह अकाउंट देश के बेरोजगार युवाओं की आवाज उठाने का दावा कर रहा है।
इस पैरोडी समूह की धमक अब राजनीतिक हलकों में भी महसूस की जा रही है। सोशल मीडिया पर चल रहे दावों के मुताबिक, तृणमूल कांग्रेस से जुड़े कुछ प्रमुख चेहरे भी प्रतीकात्मक रूप से इससे जुड़ते नजर आए हैं। इनमें सांसद महुआ मोइत्रा और पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद जैसे बड़े नाम सोशल मीडिया पोस्ट्स में चर्चा का विषय बने हुए हैं। हालांकि, इस जुड़ाव को पूरी तरह ऑनलाइन पैरोडी और डिजिटल एक्टिविटी के दायरे में ही देखा जा रहा है।
यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब CJI जस्टिस सूर्यकांत ने एक अदालती सुनवाई के दौरान बेरोजगारी और युवाओं की सामाजिक भूमिका को लेकर एक मौखिक टिप्पणी की थी। खबरों के मुताबिक, उन्होंने “कॉकरोच” शब्द का इस्तेमाल करते हुए कुछ युवाओं के मीडिया, सोशल मीडिया और आरटीआई एक्टिविज्म में शामिल होने का जिक्र किया था। इस शब्द के चयन को लेकर युवाओं और सोशल मीडिया यूजर्स ने कड़ी आपत्ति जताई और देखते ही देखते यह एक बड़ा ट्रेंड बन गया।
मामला बढ़ता देख जस्टिस सूर्यकांत की ओर से भी इस पर आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आया है। उन्होंने साफ किया कि उनके बयान का गलत संदर्भ निकाला गया है। CJI के मुताबिक, उनकी टिप्पणी का उद्देश्य युवाओं की आलोचना करना नहीं, बल्कि फर्जी डिग्रियों और पेशे में बढ़ रही अनियमितताओं की ओर ध्यान आकर्षित करना था। उन्होंने इस बात पर भी दुख जताया कि मीडिया के एक वर्ग द्वारा उनकी मौखिक टिप्पणी को गलत ढंग से पेश किया गया।
जस्टिस सूर्यकांत की सफाई के बावजूद सोशल मीडिया पर व्यंग्य, मीम्स और तीखी बहस का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। जहां एक तरफ देश का युवा वर्ग इसे रचनात्मक विरोध और अभिव्यक्ति की आजादी के रूप में देख रहा है, वहीं दूसरी तरफ कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अदालती टिप्पणियों पर इस तरह की प्रतिक्रियाएं अतिशयोक्ति हैं। बहरहाल, यह मामला इस समय डिजिटल स्पेस में सबसे बड़ा ट्रेंडिंग टॉपिक बना हुआ है।
