असम विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। जहाँ एक ओर भाजपा और कांग्रेस के बीच कड़ी टक्कर देखी जा रही है, वहीं इस बार पूर्वोत्तर की राजनीति में झारखंड की सत्ताधारी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा की एंट्री ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में JMM इस चुनाव के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान पुख्ता करने की कोशिश में है।
‘एकला चलो’ की राह पर JMM
झारखंड में कांग्रेस के साथ गठबंधन में सरकार चला रही JMM ने असम में ‘एकला चलो’ की रणनीति अपनाई। सीटों के बंटवारे पर सहमति न बनने के बाद पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। हालांकि, पार्टी ने 21 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन तकनीकी कारणों से 5 उम्मीदवारों के नामांकन रद्द होने के बाद अब 16 सीटों पर JMM के योद्धा मैदान में हैं।
‘ST दर्जा’ बना चुनावी हथियार
JMM की पूरी चुनावी रणनीति असम के करीब 70 लाख चाय बागान श्रमिकों के इर्द-गिर्द सिमटी रही। इन श्रमिकों का मूल संबंध झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र से है। हेमंत सोरेन ने अपने चुनाव प्रचार में इन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया, जो दशकों से असम की राजनीति में एक संवेदनशील विषय रहा है।









