टाटा ट्रस्ट्स की अहम बैठक पर संकट, बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका; फैसलों को अवैध घोषित करने की मांग

टाटा ट्रस्ट्स की अहम बैठक पर संकट, बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका; फैसलों को अवैध घोषित करने की मांग

Johar News Times
6 Min Read

देश के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में शामिल टाटा समूह की परोपकारी इकाई टाटा ट्रस्ट्स एक नए कानूनी विवाद में घिर गई है। बॉम्बे हाई कोर्ट में बुधवार को दायर एक रिट याचिका में टाटा ट्रस्ट्स की शुक्रवार को प्रस्तावित अहम बैठक पर रोक लगाने की मांग की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) ने महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट कानून में 2025 में किए गए संशोधन का उल्लंघन किया है।

याचिका में यह भी मांग की गई है कि 1 सितंबर 2025 के बाद मौजूदा बोर्ड द्वारा लिए गए सभी निर्णयों को अमान्य घोषित किया जाए।

- Advertisement -
Ad image

संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर हुई याचिका

यह याचिका सुरेश तुलसीराम पाटीलखेड़े ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर की है। याचिकाकर्ता का कहना है कि सर रतन टाटा ट्रस्ट के मौजूदा बोर्ड की संरचना महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट (द्वितीय संशोधन) अधिनियम, 2025 के प्रावधानों के खिलाफ है।

अगर हाई कोर्ट तत्काल सुनवाई करते हुए राहत देता है, तो शुक्रवार को होने वाली टाटा ट्रस्ट्स की महत्वपूर्ण बैठक टल सकती है। माना जा रहा है कि इस बैठक में लिए जाने वाले फैसलों का असर टाटा संस के प्रशासन और नियंत्रण व्यवस्था पर पड़ सकता है।

कौन हैं याचिकाकर्ता?

- Advertisement -
Ad image

सार्वजनिक जानकारी के अनुसार, सुरेश पाटीलखेड़े एलिगेंट रियल्टी एंड माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड और ईपीके इंफ्रास्ट्रक्चर्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक हैं। ठाणे निवासी पाटीलखेड़े ने 2024 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कोपरी-पचपखाड़ी सीट से चुनाव भी लड़ा था। चुनावी हलफनामे में उन्होंने अपना व्यवसाय किसान बताया था।

बैठक में क्या होगा बड़ा फैसला?

शुक्रवार को होने वाली बैठक के एजेंडे में टाटा संस के बोर्ड में ट्रस्टों के प्रतिनिधित्व की समीक्षा शामिल है। वर्तमान में टाटा संस बोर्ड में ट्रस्टों की ओर से नोएल टाटा और उपाध्यक्ष वेनु श्रीनिवासन प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

- Advertisement -
Ad image

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सर रतन टाटा ट्रस्ट के पास टाटा संस में 23.56 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जबकि सभी टाटा ट्रस्ट्स की संयुक्त हिस्सेदारी करीब 66 प्रतिशत है।

कानून में क्या हुआ बदलाव?

महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट्स (संशोधन) अध्यादेश, 2025 के तहत धारा 30ए(2) जोड़ी गई है। इसके अनुसार, यदि किसी ट्रस्ट के दस्तावेज में स्थायी या आजीवन ट्रस्टियों की संख्या का स्पष्ट प्रावधान नहीं है, तो उनकी संख्या कुल ट्रस्टियों के एक-चौथाई यानी 25 प्रतिशत तक सीमित रहेगी।

यह नियम 1 सितंबर 2025 से लागू हुआ है और सभी ट्रस्टों के लिए इसका पालन अनिवार्य बताया गया है।

आजीवन ट्रस्टियों को लेकर विवाद

याचिका के अनुसार, सर रतन टाटा ट्रस्ट में वर्तमान में कुल छह ट्रस्टी हैं, जिनमें तीन — जिमी नवल टाटा, जहांगीर एच.सी. जहांगीर और नोएल नवल टाटा आजीवन ट्रस्टी हैं। यानी बोर्ड का 50 प्रतिशत हिस्सा स्थायी ट्रस्टियों का है, जबकि कानून इसकी सीमा 25 प्रतिशत तय करता है।

याचिका में कहा गया है कि यदि तीन आजीवन ट्रस्टियों को बनाए रखना है तो बोर्ड की कुल संख्या 12 करनी होगी। मौजूदा व्यवस्था में केवल एक स्थायी ट्रस्टी ही वैध माना जा सकता है।

दिवंगत रतन टाटा के भाई जिमी टाटा सबसे लंबे समय से आजीवन ट्रस्टी हैं। उन्हें 1989 में यह जिम्मेदारी दी गई थी।

किन्हें बनाया गया पक्षकार?

याचिका में महाराष्ट्र सरकार, चैरिटी कमिश्नर, सर रतन टाटा ट्रस्ट के अलावा नोएल टाटा, वेनु श्रीनिवासन, विजय सिंह, जिमी एन टाटा, जहांगीर एचसी जहांगीर और दारियस खंबाता को प्रतिवादी बनाया गया है।

याचिका में क्या-क्या मांगें?

याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि:

  • 8 मई को प्रस्तावित बोर्ड बैठक पर तत्काल रोक लगाई जाए।
  • जब तक बोर्ड का पुनर्गठन कानून के अनुसार न हो जाए, तब तक कोई नया प्रस्ताव पारित न किया जाए।
  • 1 सितंबर 2025 के बाद मौजूदा बोर्ड द्वारा लिए गए सभी फैसलों को अवैध घोषित किया जाए।

अन्य मुद्दों पर भी होगी चर्चा

सूत्रों के अनुसार, शुक्रवार की बैठक में दो उपाध्यक्षों, वेनु श्रीनिवासन और विजय सिंह द्वारा मीडिया में दिए गए उन बयानों पर भी चर्चा हो सकती है, जिनमें टाटा संस को सूचीबद्ध (लिस्टेड) करने का समर्थन किया गया था।

इसके अलावा, वकील कात्यायनी अग्रवाल द्वारा चैरिटी कमिश्नर के समक्ष दायर शिकायत पर भी विचार होने की संभावना है, जिसमें स्थायी ट्रस्टियों को लेकर समान आपत्तियां उठाई गई थीं।

1 सितंबर 2025 के बाद लिए गए बड़े फैसले

याचिका में कहा गया है कि संशोधित कानून लागू होने के बाद ट्रस्ट द्वारा कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए, जिनमें विजय सिंह को टाटा संस बोर्ड से हटाना और मेहली मिस्त्री को दोबारा ट्रस्टी नियुक्त नहीं करना शामिल है।

आम नागरिक भी क्यों कर सकता है याचिका?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अनुच्छेद 226 के तहत कोई भी नागरिक सार्वजनिक हित से जुड़े मामलों में हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है। चूंकि टाटा ट्रस्ट सार्वजनिक ट्रस्ट हैं और इनके लाभार्थी आम लोग हैं, इसलिए किसी भी नागरिक को इस तरह की याचिका दायर करने का अधिकार प्राप्त है।

Share This Article